रोटियाँ

रोटियाँ

माँ अब नहीं सेंकती हैं रोटियाँ मिट्टी के चूल्हे जलाकर खपरी या तबे पर। अब यह काम नेताओं ने पकड़ लिया है अब वे ही सेंकते हैं रोटियाँ सि...
नीलकंठ

नीलकंठ

कौन कहता है कि अब तुम याद नहीं आते कौन कहता है कि हमारी स्मृति में, हमारी कृति में, तुम नहीं हो! तुम्हीं तो थे जो जान लेते थे मेरे म...
कल

कल

'कल' कितना सुखकर होता है, जिसपर आज का बोझ लादकर हम निश्चिन्त हो जाते हैं। आज के भारी से भारी बोझ को उठा लेने में समर्थ होता है ...
यात्रा

यात्रा

पता नहीं! कितना सत्य है डार्विन का 'विकासवादी सिद्धांत' कि मानव का विकास हुआ पशुओं से(बंदरों से) झड़ गयी हमारी पूँछ होने लगे ख...
आजादी

आजादी

आजादी, कोई नन्हीं- सी, प्यारी-सी अबोध-सी बच्ची नहीं है, वह उछलती- कूदती बाला भी नहीं, वह किसी को लुभाने वाली स्त्री भी नहीं है, वह तो ...
कौन है वह

कौन है वह

कौन है वह! जो दंगे में शरीक है, जो पत्थर फेंकता है, जो घर जलाता है, जो सड़क जाम करता है! कहीं वह भूखा आदमी तो नहीं, जो अपनी रोटी के ल...
दंगा

दंगा

कौन कहता है कि दंगे में मुसलमान से हिन्दू  लड़ता है और हिन्दू से मुसलमान लड़ता है मैंने तो देखा कि दोनों के भीतर का हैवान , हैवान से लड...
कुछ सवाल

कुछ सवाल

कुछ सवाल मेरे मन में उठते हैं अक्सर कुछ सवाल कि क्या वे भी जलाते होंगे अगरबत्तियाँ जो रोज़ खुशबू रचते हैं, या यूँ ही महकता होगा उनका...
भूख

भूख

लघुकथा          जाड़े की कँपकपाती हुई सुबह में कुहरे की गुहा को भेदते हुए एक- एक कर चार मैनें(एक प्रकार की चिड़िया) खेत में उतर आये। खेत ...
मुझे आने दो

मुझे आने दो

माँ! मुझे आने दो पीड़ा तो होगी तुम्हें अवश्य, पर पाओगी तुम भी गर्व मातृत्व का, होगा पूर्ण तेरा भी नारीत्व, जिसके लिए कर दिया था तून...
कापीराइट

कापीराइट

कविता कौन कहता है कि इस दुनिया को ईश्वर ने रच- रच कर बनाया है? मुझे तो लगता है कि इसे जरूर किसी मजदूर ने बनाया होगा। उसने ही गढ़ा हो...
मुआवजा

मुआवजा

कहानी         कंपनी ने जब किसी की एक न सुनी तो सारे मजदूर सड़क पर उतर आये। जीतन अपने दोनों बैसाखियों को  काँख में दबाए हुए सबसे आगे चल रह...
हिन्दी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्रभाषा

हिन्दी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्रभाषा

देववाणी संस्कृत की सबसे ज्येष्ठ पुत्री हिन्दी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी संरक्षिका एवं सामाजिक,राजनीतिक और धार्मिक विचारों की संवाहिका है...
अछूत

अछूत

लघुकथा           महेसर ने हल पटक कर बैलों को सानी- पानी दिया और आंगन की ओर बढ़ते हुए कहा- "मालकिन....मालकिन.....अरे घर में कोई है कि...
राजमहल

राजमहल

राजमहल वह नहीं, जहाँ पर प्रतिक्षण हो रंग-रलियाँ। जहाँ वासना की बजती हो, नयी- नयी पैजनियाँ ।। बालाओ के अरुण अधर का होता हो नित चुम्बन...
कोशी- पुत्र

कोशी- पुत्र

कहानी 'किसन अधपगला है ! गंजेड़ी- भंगेड़ी है, जो मन में फुराता है, वही करने में रम जाता है! कोशी की कछेर में थोड़ी- सी जमीन क्या जगी, चला...
वह कौन?

वह कौन?

 वह कौन, जिसने बजा दिया मेरे अंतस की वीणा का तार ? तप्त मरु में बहा दिया सरिता नीरस मन में जगा दिया प्यार ? वह कौन,जिसे पा नहीं सकते ...
उधरुआ जात

उधरुआ जात

कहानी           उस रात न तो दादी को नींद आयी  न मुझे।चाचा जी उधर अलग बार-बार करवट फेर रहे थे।लेकिन दादा जी आराम से खर्राटे ले रहे थे।ले भ...
जिन्दगी का जंग

जिन्दगी का जंग

कहानी मेढ़क  का टर्र-टर्र और पंडुक की टिहुक-टिहुक के साथ कोशी नदी की कल-कल की ध्वनि अंधेरी रात की निःशब्दता को भंग कर रही थी। पूरा गाँव...