फुलेसरी रामेसर का पैर दबाकर न जाने कब से खर्राटे ले रही थी, परंतु रामेसर का मन बेचैन था। वह बार-बार करवट ले रहा था। 'खेत का भरना(गिरवी) छुड़ाकर क्या होगा, फिर तो बटाई पर ही लगाना है! कौन- सा अपने जोतना है?' सुरेश की एक-एक बात उसे बरछी की तरह भेद रहा था। खेत न होता तो उसकी पढ़ाई-लिखाई भी कैसे होती! आज दारोगा बन गया तो...... शहर में बस जाने से आदमी को अपने खेत का भैलू नहीं बुझाता है!
रामेसर बहुत उम्मीद लेकर सुरेश से मिलने गया था, पर सारी उम्मीदें हवा हो गयीं। सुरेश पिछली दीपावली पर भी घर नहीं आया और इस बार भी। इसलिए फुलेसरी काफी बेचैन होकर उसे भेजी थी।
रामेसर दरभंगा पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। उसने सुरेश को फोन लगाया तो लगातार बिजी बता रहा था। घंटे भर बाद सुरेश ने फोन कर बताया कि लेने आ रहा हूँ।
रामेसर अपना तुड़ा-मुड़ा कुर्ता सरियाते हुए स्वेटर को चौतरफ खींचकर अपने साईज में लाने लगा।शायद वह दारोगा के बाप की तरह दिखना चाह रहा था। लेकिन सुरेश के एक फोन ने उसकी सारी बापगिरी निकाल दी।
"आप कहाँ हैं?" सुरेश ने पूछा।
"टीशन पर।"
"ओ,देखिए न मुझे एक अरजेंट मीटिंग में जाना है। आप वहीं वेट कीजिए, हम लेने आ जाएंगे।"
"बहू तो घर में होगी न बेटा।"
"हाँ, नहीं-नहीं वह गोलू को लेकर नैहर गयी है।सबेरे आएगी।"
"ओ, अच्छा ठीक है।" रामेसर का उत्साह ठंडा पड़ गया। वह गमछा बिछाकर बोरे को सिरहाने में लिया और आते-जाते लोगों में अपने बेटे को खोजने लगा।खोजता रहा...खोजता रहा...... रात के ग्यारह बज गए.....वह नहीं आया....बारह बज गए....नहीं आया। मोबाइल पहले..... व्यस्त आ रहा था फिर बंद......लगातार बंद।
रामेसर का मन भूख से कुलबुलाने लगा।बोरे में खाने के कई सामान थे- अगहनी चावल का बगिया.... दालपूरी.....गाय के दूध का पेड़ा, पर उसने हाथ न लगाया। उसे तो बस चिंता थी इन सामानों के बासी हो जाने की।
स्टेशन पर लोगों की भीड़ लगी थीं।काफी शोरगुल था, लेकिन करवट बदलते-बदलते रामेसर कब खर्राटे लेने लगा, कुछ पता नहीं! उसकी नींद तब खुली, जब एक सफाईकर्मी ने उसे झमारकर उठाया। पानी के रेले से बोरे का निचला तह भींग गया था। वह गमछे से बोरे को पोछते हुए लोहे के स्टैंड वाली कुर्सी पर जा बैठा।
सुबह के आठ बजे सुरेश आया। बहू घर आ चुकी थी। गोलू आकर उसकी गोद में बैठ गया। उसकी तोतली वाणी को सुनकर रामेसर का कलेजा जुरा गया। गाय के दूध का असली पेड़ा खाते हुए गोलू का मन भी रमता जा रहा था। वह बोला-" दादा जी आप मेले को क्या गिप्ट देंगे? लात में मेला बल्त डे था....आप क्यों नहीं आए?"
रामेसर का देह सनसना गया।वह देहाती था तो क्या हुआ, इतना तो समझ ही सकता था! पंखे से लटकते हुए बैलून, जिसमें अब दो-चार ही साबुत थे।घर अब भी अस्त-व्यस्त लग रहा था। केक के एकाध टुकड़े फर्स बिखरे पड़े थे, जिन्हें चीटियों ने अपने-अपने दल के साथ घेर रखा था। डायनिंग टेबल पर चार अधजली मोमबत्तियाँ लावारिस पड़ी थीं। उसने अपने को संभालते हुए कहा-"हाँ बाबू , क्यों नहीं गिफ्ट मिलेगा? जरूर मिलेगा।देख तेरी दादी ने तेरे लिए क्या दिया है।"
फिर उसने बोरे से एक पालीथिन निकाला, जिसमें गोलू के लिए हाथ का बिना हुआ फुल स्वेटर था।
गोलू स्वेटर लेकर नाचते हुए अपनी मम्मी को दिखाने पहुंच गया।
"अच्छा है।" बहू ने उसकी ओर उपेक्षा भाव से देखते हुए कहा, लेकिन उसके मुँह से निकले हुए शेष शब्द थे-"थर्ड क्लास।"
"बाबू ,मम्मी को बोलो, इसमें खाने- पीने के सामान हैं।" रामेसर ने बोरे की ओर इशारा करते हुए बहू को सुनाकर कहा।
बहू तेजी से आकर बोरे को घिसियाते हुए किचेन तक ले गयी और फिर उसका निचला खूँट पकड़ते हुए सीधे पलट दी। रामेसर को यह सब देख कर लगा कि मानो उसे किसी ने एक क्षण के लिए उलटा कर दिया हो। सरसो और मेथी के साग अब पूरी तरह से मुरझा गये थे। बगिया और दालपूरी को बहू बार- बार नाक लगाकर सूंघ रही थी। रामेसर बोरे से निकले हुए सामान की भाँति ही बिखरता जा रहा था।
सुरेश ऑफिस के लिए तैयार होकर नास्ते के लिए डायनिंग टेबल पर बैठ गया। बहू दो थालियों में नास्ता परोस कर लायी -मटर पनीर की सब्जी, बैगन -अदौरी की रसदार सब्जी, दाल फ्राई और सलाद के साथ बगिया और दालपूरी।
रामेसर की भूख बढ़ गई। बगिया रूख हो जाने के कारण और भी मीठा हो गया था। दालपूरी से बासीपन की हल्की-सी गंध जरूर आ रही थी, पर वह बासी सब्जियों का साथ दे रहा था।
रामेसर की बात नहीं बनीं। सुरेश ने खेत छुड़ाने से मना कर दिया। उसने साफ कह दिया कि उनके पास इन सब कामों के लिए पैसे नहीं हैं। वैसे भी खेत खुद तो जोतना है नहींं।पहले से ही दो बीघे बटाई पर लगे हैं, उससे दो जने के खाने लायक अनाज तो आ ही जाता है।
रामेसर कुछ न बोला।चुपचाप सुनता गया। सहता गया। पीता गया। दो बजेे वापसी की गाडी थी । बहू ने वही बोरा थमाकर मुँह में साड़ी का पल्लू दबाते हुुुए कहा- "इसमें माँ के लिए साड़ियाँ और स्वेटर हैं।आपके लिए साल और बंडी।होली की छुट्टी में हमलोग गाँव आएंगे।"
रामेसर बोरे को पजियाकर गाडी में बैठ गया। गाड़ी जितनी तेजी से उनके गाँव के करीब पहुँच रही थी, वह उतनी ही तेजी से अपने बेटे और बहू से दूूर होता जा रहा था। उसका मन ओकिया रहा था , मानो बाासीपन की गंध ने उसे चारों तरफ़ से घेर लिया हो।यह गंध उसके पेेेट से आ रही थी या बोरे के महीन रंधों से, कुछ पता नहीं चल रहा था।
रामेसर ने सबेेरे- सबेरे बैलों को सानी- पानी देकर ओलती से टंगे हल को उतारा और पच्चरों को टाइट किया।फुुुलेेेसरी आज देर से जगी।शायद बहू की देेेह के स्वेेटर ने उसे पूरी तरह से गरमा दिया था। रामेसर को देखकर उनकी आँखें गोल हो गयीं - "अरे सठिया गये हैं आप .......हल ठोककर कौन-सा बरहबीघा जोतनेे जाएंगे।"
"है न अपन दो बीघा खेत, उसी को जोतने जा रहे हैं।" रामेसर ने उत्तर दिया। "तू गरमागरम रोटी बनाना।बासी-तबाासी खाने की आदत नहीं है मेरी।"
फुलेसरी कुुुछ समझ न सकी। बोली- "खेत तो जुुगेेेसर को बटाई पर दे रखे हैं।"
"उसको रात ही बोल दिए कि भाई खेत छोड़ दो, हम अपने जोतेंगे। क्या नहीं है हमारे पास, हल है....बैल है... और बाजू में दम है। कोढिया बनने सेे काम नहीं चलेगा।"
"पर लोग क्या कहेंगे..... बेटा पुलिस- दरोगा और बाप....?"
"कहने दो लोगोंं को जो कहना है।हम अपन खेत जोतने जा रहे हैं, कोनो चोरी- चमारी करने नहीं जा रहे हैं।"
"कहने वाले कहते गए....हँसने वाले हँँसते गए । रामेसर के खेत में जल्द ही गेहूं की फसल लहलहाने लगी। खेत के मेेड पर घूूमते हुए रामेसर और फुुलेसरी की दो जोड़ी आँँखें चमक रही थीं। अब वे बेसहारा नहीं थे। गेेहूं केे असंख्य पौधे ही उनके संतान थे। पौधे की जड़ से फूटने वाली कोपलें ही नाती- पोते।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
रामेसर बहुत उम्मीद लेकर सुरेश से मिलने गया था, पर सारी उम्मीदें हवा हो गयीं। सुरेश पिछली दीपावली पर भी घर नहीं आया और इस बार भी। इसलिए फुलेसरी काफी बेचैन होकर उसे भेजी थी।
रामेसर दरभंगा पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। उसने सुरेश को फोन लगाया तो लगातार बिजी बता रहा था। घंटे भर बाद सुरेश ने फोन कर बताया कि लेने आ रहा हूँ।
रामेसर अपना तुड़ा-मुड़ा कुर्ता सरियाते हुए स्वेटर को चौतरफ खींचकर अपने साईज में लाने लगा।शायद वह दारोगा के बाप की तरह दिखना चाह रहा था। लेकिन सुरेश के एक फोन ने उसकी सारी बापगिरी निकाल दी।
"आप कहाँ हैं?" सुरेश ने पूछा।
"टीशन पर।"
"ओ,देखिए न मुझे एक अरजेंट मीटिंग में जाना है। आप वहीं वेट कीजिए, हम लेने आ जाएंगे।"
"बहू तो घर में होगी न बेटा।"
"हाँ, नहीं-नहीं वह गोलू को लेकर नैहर गयी है।सबेरे आएगी।"
"ओ, अच्छा ठीक है।" रामेसर का उत्साह ठंडा पड़ गया। वह गमछा बिछाकर बोरे को सिरहाने में लिया और आते-जाते लोगों में अपने बेटे को खोजने लगा।खोजता रहा...खोजता रहा...... रात के ग्यारह बज गए.....वह नहीं आया....बारह बज गए....नहीं आया। मोबाइल पहले..... व्यस्त आ रहा था फिर बंद......लगातार बंद।
रामेसर का मन भूख से कुलबुलाने लगा।बोरे में खाने के कई सामान थे- अगहनी चावल का बगिया.... दालपूरी.....गाय के दूध का पेड़ा, पर उसने हाथ न लगाया। उसे तो बस चिंता थी इन सामानों के बासी हो जाने की।
स्टेशन पर लोगों की भीड़ लगी थीं।काफी शोरगुल था, लेकिन करवट बदलते-बदलते रामेसर कब खर्राटे लेने लगा, कुछ पता नहीं! उसकी नींद तब खुली, जब एक सफाईकर्मी ने उसे झमारकर उठाया। पानी के रेले से बोरे का निचला तह भींग गया था। वह गमछे से बोरे को पोछते हुए लोहे के स्टैंड वाली कुर्सी पर जा बैठा।
सुबह के आठ बजे सुरेश आया। बहू घर आ चुकी थी। गोलू आकर उसकी गोद में बैठ गया। उसकी तोतली वाणी को सुनकर रामेसर का कलेजा जुरा गया। गाय के दूध का असली पेड़ा खाते हुए गोलू का मन भी रमता जा रहा था। वह बोला-" दादा जी आप मेले को क्या गिप्ट देंगे? लात में मेला बल्त डे था....आप क्यों नहीं आए?"
रामेसर का देह सनसना गया।वह देहाती था तो क्या हुआ, इतना तो समझ ही सकता था! पंखे से लटकते हुए बैलून, जिसमें अब दो-चार ही साबुत थे।घर अब भी अस्त-व्यस्त लग रहा था। केक के एकाध टुकड़े फर्स बिखरे पड़े थे, जिन्हें चीटियों ने अपने-अपने दल के साथ घेर रखा था। डायनिंग टेबल पर चार अधजली मोमबत्तियाँ लावारिस पड़ी थीं। उसने अपने को संभालते हुए कहा-"हाँ बाबू , क्यों नहीं गिफ्ट मिलेगा? जरूर मिलेगा।देख तेरी दादी ने तेरे लिए क्या दिया है।"
फिर उसने बोरे से एक पालीथिन निकाला, जिसमें गोलू के लिए हाथ का बिना हुआ फुल स्वेटर था।
गोलू स्वेटर लेकर नाचते हुए अपनी मम्मी को दिखाने पहुंच गया।
"अच्छा है।" बहू ने उसकी ओर उपेक्षा भाव से देखते हुए कहा, लेकिन उसके मुँह से निकले हुए शेष शब्द थे-"थर्ड क्लास।"
"बाबू ,मम्मी को बोलो, इसमें खाने- पीने के सामान हैं।" रामेसर ने बोरे की ओर इशारा करते हुए बहू को सुनाकर कहा।
बहू तेजी से आकर बोरे को घिसियाते हुए किचेन तक ले गयी और फिर उसका निचला खूँट पकड़ते हुए सीधे पलट दी। रामेसर को यह सब देख कर लगा कि मानो उसे किसी ने एक क्षण के लिए उलटा कर दिया हो। सरसो और मेथी के साग अब पूरी तरह से मुरझा गये थे। बगिया और दालपूरी को बहू बार- बार नाक लगाकर सूंघ रही थी। रामेसर बोरे से निकले हुए सामान की भाँति ही बिखरता जा रहा था।
सुरेश ऑफिस के लिए तैयार होकर नास्ते के लिए डायनिंग टेबल पर बैठ गया। बहू दो थालियों में नास्ता परोस कर लायी -मटर पनीर की सब्जी, बैगन -अदौरी की रसदार सब्जी, दाल फ्राई और सलाद के साथ बगिया और दालपूरी।
रामेसर की भूख बढ़ गई। बगिया रूख हो जाने के कारण और भी मीठा हो गया था। दालपूरी से बासीपन की हल्की-सी गंध जरूर आ रही थी, पर वह बासी सब्जियों का साथ दे रहा था।
रामेसर की बात नहीं बनीं। सुरेश ने खेत छुड़ाने से मना कर दिया। उसने साफ कह दिया कि उनके पास इन सब कामों के लिए पैसे नहीं हैं। वैसे भी खेत खुद तो जोतना है नहींं।पहले से ही दो बीघे बटाई पर लगे हैं, उससे दो जने के खाने लायक अनाज तो आ ही जाता है।
रामेसर कुछ न बोला।चुपचाप सुनता गया। सहता गया। पीता गया। दो बजेे वापसी की गाडी थी । बहू ने वही बोरा थमाकर मुँह में साड़ी का पल्लू दबाते हुुुए कहा- "इसमें माँ के लिए साड़ियाँ और स्वेटर हैं।आपके लिए साल और बंडी।होली की छुट्टी में हमलोग गाँव आएंगे।"
रामेसर बोरे को पजियाकर गाडी में बैठ गया। गाड़ी जितनी तेजी से उनके गाँव के करीब पहुँच रही थी, वह उतनी ही तेजी से अपने बेटे और बहू से दूूर होता जा रहा था। उसका मन ओकिया रहा था , मानो बाासीपन की गंध ने उसे चारों तरफ़ से घेर लिया हो।यह गंध उसके पेेेट से आ रही थी या बोरे के महीन रंधों से, कुछ पता नहीं चल रहा था।
रामेसर ने सबेेरे- सबेरे बैलों को सानी- पानी देकर ओलती से टंगे हल को उतारा और पच्चरों को टाइट किया।फुुुलेेेसरी आज देर से जगी।शायद बहू की देेेह के स्वेेटर ने उसे पूरी तरह से गरमा दिया था। रामेसर को देखकर उनकी आँखें गोल हो गयीं - "अरे सठिया गये हैं आप .......हल ठोककर कौन-सा बरहबीघा जोतनेे जाएंगे।"
"है न अपन दो बीघा खेत, उसी को जोतने जा रहे हैं।" रामेसर ने उत्तर दिया। "तू गरमागरम रोटी बनाना।बासी-तबाासी खाने की आदत नहीं है मेरी।"
फुलेसरी कुुुछ समझ न सकी। बोली- "खेत तो जुुगेेेसर को बटाई पर दे रखे हैं।"
"उसको रात ही बोल दिए कि भाई खेत छोड़ दो, हम अपने जोतेंगे। क्या नहीं है हमारे पास, हल है....बैल है... और बाजू में दम है। कोढिया बनने सेे काम नहीं चलेगा।"
"पर लोग क्या कहेंगे..... बेटा पुलिस- दरोगा और बाप....?"
"कहने दो लोगोंं को जो कहना है।हम अपन खेत जोतने जा रहे हैं, कोनो चोरी- चमारी करने नहीं जा रहे हैं।"
"कहने वाले कहते गए....हँसने वाले हँँसते गए । रामेसर के खेत में जल्द ही गेहूं की फसल लहलहाने लगी। खेत के मेेड पर घूूमते हुए रामेसर और फुुलेसरी की दो जोड़ी आँँखें चमक रही थीं। अब वे बेसहारा नहीं थे। गेेहूं केे असंख्य पौधे ही उनके संतान थे। पौधे की जड़ से फूटने वाली कोपलें ही नाती- पोते।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteThanks
Deleteधन्यवाद।
Deleteबबहु बहुत बधाई
ReplyDeleteधन्यवाद।
ReplyDeleteBahut Achchhi kahani
ReplyDeleteReality ko ujagar kiya gya hai
बहुत-बहुत धन्यवाद।
DeleteThis comment has been removed by the author.
DeleteBahut Achchhi kahani
ReplyDeleteReality ko ujagar kiya gya hai