'मार्क्सवाद-प्रगतिवाद' के बाद समकालीन भारतीय साहित्य में 'दलितवाद' एक बड़ा विक्षोभ है, जिसने साहित्य और संस्कृति की दशा-दिशा में परिवर्तनकारी मोड़ दिया है।जब-जब क्रांति होती है, परंपरा का नये सिरे से मूल्यांकन होता है।पुराने पैटर्न टूटते हैं।और नये मूल्यों का निर्माण होता है।कथा साहित्य के पैटर्न में प्रेमचंद ऐसे सौभाग्यशाली लेखक हैं, जिनकी चर्चा मार्क्सवाद के जमाने में उतनी ही हुई और आज दलित उभार के जमाने में भी उतनी ही हो रही है।यद्यपि आज के कुछ दलित साहित्य के खेमेबाजों ने प्रेमचंद को 'सामंतों का मुंशी' कहकर दलित साहित्य के पाले से बाहर फेंकने की कोशिश की है, परंतु प्रेमचंद साहित्य में अंतर्निहित दलित चेतना किसी भी बड़े दलित लेखक की चेतना से टक्कर लेने का सामर्थ्य रखती है।
प्रेमचंद निश्चय ही जन्मना गैरदलित लेखक हैं, किन्तु वे हिन्दी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं,जो गाँधीवाद के जितने करीब हैं, उतने ही मार्क्सवाद, स्त्रीवाद और अंबेडकरवाद के भी।अंबेडकर से प्रभावित होने के कारण ही वे उनके हर आंदोलन पर कहानी लिखते हैं।उनकी ऐसी कहानियों में 'मंदिर'(1927),'मंत्र'(1928),'ठाकुर का कुआँ'(1932),'दूध का दाम'(1934)आदि प्रमुख हैं।इन कहानियों पर अंबेदकर के 'महार' और 'कालाराम मंदिर' आंदोलनों का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सदगति' में दलित चेतना की धारदार अभिव्यक्ति हुई है।पंडित जी की हृदयहीनता और बेगार लेने की प्रवृति का शिकार हो जाता है-दुखी चमार।उसके मरने के बाद चमारों का कुनवा लाश की उठाने से मना कर देता है और अंततः पंडित जी के हाथों चमार की लाश फेंकवा कर प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी ढोंग पर आघात किया है।यहाँ तथाकथित पवित्रता और छुआछूत की धज्जियाँ उड़ जाती हैं।जीते जी जिसकी छाया से भी छूत लगती है। मरने के बाद उसी की लाश पंडित जी को ढ़ोनी पड़ती है।धार्मिक-सामाजिक पाखंड और छुआछूत की ब्राह्मणी व्यवस्था पर इससे बड़ा प्रहार क्या हो सकता है।
ठीक इसी प्रकार 'ठाकुर का कुआँ' की मारक संवेदना से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्यासे बीमार पति जोखू को ताजा पानी पिलाना गंगी के लिए समस्या है।जोखू कहता है-"पानी भरने पर ब्राह्मण देवता आशीर्वाद अर्थात् गाली देंगे, ठाकुर लाठी मारेंगे तथा साहूजी एक के पाँच वसूलेंगे।गरीबों का दर्द कौन समझता है।" इसके साथ ही जोखू इन लोगों की श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाते हुए कहता है-"हम क्यों नीच हैं और ये लोग ऊँचे हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं।......यहाँ तो जितने भी हैं, एक से एक छँटे हैं।चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें.....काम करा लेते हैं, मजदूरी देतेदेते नानी मरती है, किस बात में हमसे बड़े हैं।" कहानी का यह संदर्भ उच्च कही जाने वाली जातियों का पोल खोलता है।
'दूध का दाम' कहानी में प्रेमचंद ने खेल-खेल में बच्चों की भावना और संवाद के द्वारा दलित चेतना की गहरी अभिव्यंजना कर डाली है।यह बच्चे मंगल और सवर्ण बच्चे सुरेश की कहानी है।दोनों के बीच का संवाद ही दलित चेतना को रेखांकित करता है।सुरेश कहता है-"तुझे कौन पीठ पर बैठाएगा,सोच।आखिर तूँ भंगी है कि नहीं ?" इसपर मंगल कड़ा जवाब देता है-"मैं कब कहता हूँ कि भंगी नहीं हूँ,लेकिन तुम्हें मेरी माँ ने दूध पिलाकर पाला है।जबतक मुझे सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोड़ा नहीं बनूंगा।तुमलोग चघड़ हो।आप तो मजे में सवारी करोगे और मैं घोड़ा ही बना रहूंगा।"
प्रेमचंद की कहानी कला का उत्कर्ष है-'कफन',जिसमें उन्होंने घीसू और माधव रूपी ताने-बाने के माध्यम से ब्राह्मणवाद की परंपरित अवधारणाओं का मखौल उड़ाया है। इन दोनों दलितों ने मशानसेवी भारतीय संस्कृति की कब्र पर व्यक्ति-स्वातंत्र्य का बीजारोपण किया है घर की स्त्री के कफन के पैसे से शराब और कवाब का का मजा लेने का आकांक्षी घीसू और माधव कफन न खरीदने के अकाट्य तर्क देते हैं-"जिसे जीते जी तन ढँकने के लिए चिथरा भी न मिला हो, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए।"
"रात को कफन कौन देखता है।"
"कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है।"
प्रेमचंद की दलित चेतना का उत्कर्ष गोदान में देखा जा सकता है।इस उपन्यास में लेखक ने सिलिया और मातादीन के प्रेम प्रसंगों के बहाने ब्राह्मणवादी शुचिता को पानी-पानी कर दिया है। सिलिया चमारिन पंडित दातादीन के बेटे मातादीन से फँसी हुई थी।एक दिन उसके पिता हरखू,माता,भाई और अन्य चमारों ने आकर मातादीन को घेर लिया।हरखू ने कहा-"तुम तो हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं।ब्राह्मण बना दो, हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है.........हमारी इज्जत लेते हो, तो अपना धरम भी दे दो।"(गोदान,पृष्ठ-208) अंततः हरखू की ललकार पर सभी चमार मातादीन को पकड़ कर उसका जनेऊ तोड़ देता हैऔर एक आदमी उसके मुँह में एक हड्डी का बड़ा सा टुकड़ा घुसेड़ देता है।असल में दलित चेतना की ऐसी धारदार अभिव्यक्ति पैदायशी दलित लेखकों की कृति में भी नहीं मिलती है।
बहरहाल, प्रेमचंद ने दलितों के संदर्भ में जो कुछ भी लिखा है, वह अपने समकालीन साहित्यकारों से आगे बढ़कर लिखा है। आज दलित चेतना के उभार के इस जमाने में भी यदि दलित रचनाकारों की सोच और दृष्टि व्यापक हुई है, तो यह समय और समाज के अनुरूप मूल्यों का विकास है। अतः कतिपय सीमाओं के बावजूद प्रेमचंद दलित चेतना के संदर्भ में प्रासंगिक बने हुए हैं।
उमेश कुमार शर्मा
हिन्दी लेखक/ब्लागर
प्रेमचंद निश्चय ही जन्मना गैरदलित लेखक हैं, किन्तु वे हिन्दी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं,जो गाँधीवाद के जितने करीब हैं, उतने ही मार्क्सवाद, स्त्रीवाद और अंबेडकरवाद के भी।अंबेडकर से प्रभावित होने के कारण ही वे उनके हर आंदोलन पर कहानी लिखते हैं।उनकी ऐसी कहानियों में 'मंदिर'(1927),'मंत्र'(1928),'ठाकुर का कुआँ'(1932),'दूध का दाम'(1934)आदि प्रमुख हैं।इन कहानियों पर अंबेदकर के 'महार' और 'कालाराम मंदिर' आंदोलनों का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सदगति' में दलित चेतना की धारदार अभिव्यक्ति हुई है।पंडित जी की हृदयहीनता और बेगार लेने की प्रवृति का शिकार हो जाता है-दुखी चमार।उसके मरने के बाद चमारों का कुनवा लाश की उठाने से मना कर देता है और अंततः पंडित जी के हाथों चमार की लाश फेंकवा कर प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी ढोंग पर आघात किया है।यहाँ तथाकथित पवित्रता और छुआछूत की धज्जियाँ उड़ जाती हैं।जीते जी जिसकी छाया से भी छूत लगती है। मरने के बाद उसी की लाश पंडित जी को ढ़ोनी पड़ती है।धार्मिक-सामाजिक पाखंड और छुआछूत की ब्राह्मणी व्यवस्था पर इससे बड़ा प्रहार क्या हो सकता है।
ठीक इसी प्रकार 'ठाकुर का कुआँ' की मारक संवेदना से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्यासे बीमार पति जोखू को ताजा पानी पिलाना गंगी के लिए समस्या है।जोखू कहता है-"पानी भरने पर ब्राह्मण देवता आशीर्वाद अर्थात् गाली देंगे, ठाकुर लाठी मारेंगे तथा साहूजी एक के पाँच वसूलेंगे।गरीबों का दर्द कौन समझता है।" इसके साथ ही जोखू इन लोगों की श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाते हुए कहता है-"हम क्यों नीच हैं और ये लोग ऊँचे हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं।......यहाँ तो जितने भी हैं, एक से एक छँटे हैं।चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें.....काम करा लेते हैं, मजदूरी देतेदेते नानी मरती है, किस बात में हमसे बड़े हैं।" कहानी का यह संदर्भ उच्च कही जाने वाली जातियों का पोल खोलता है।
'दूध का दाम' कहानी में प्रेमचंद ने खेल-खेल में बच्चों की भावना और संवाद के द्वारा दलित चेतना की गहरी अभिव्यंजना कर डाली है।यह बच्चे मंगल और सवर्ण बच्चे सुरेश की कहानी है।दोनों के बीच का संवाद ही दलित चेतना को रेखांकित करता है।सुरेश कहता है-"तुझे कौन पीठ पर बैठाएगा,सोच।आखिर तूँ भंगी है कि नहीं ?" इसपर मंगल कड़ा जवाब देता है-"मैं कब कहता हूँ कि भंगी नहीं हूँ,लेकिन तुम्हें मेरी माँ ने दूध पिलाकर पाला है।जबतक मुझे सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोड़ा नहीं बनूंगा।तुमलोग चघड़ हो।आप तो मजे में सवारी करोगे और मैं घोड़ा ही बना रहूंगा।"
प्रेमचंद की कहानी कला का उत्कर्ष है-'कफन',जिसमें उन्होंने घीसू और माधव रूपी ताने-बाने के माध्यम से ब्राह्मणवाद की परंपरित अवधारणाओं का मखौल उड़ाया है। इन दोनों दलितों ने मशानसेवी भारतीय संस्कृति की कब्र पर व्यक्ति-स्वातंत्र्य का बीजारोपण किया है घर की स्त्री के कफन के पैसे से शराब और कवाब का का मजा लेने का आकांक्षी घीसू और माधव कफन न खरीदने के अकाट्य तर्क देते हैं-"जिसे जीते जी तन ढँकने के लिए चिथरा भी न मिला हो, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए।"
"रात को कफन कौन देखता है।"
"कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है।"
प्रेमचंद की दलित चेतना का उत्कर्ष गोदान में देखा जा सकता है।इस उपन्यास में लेखक ने सिलिया और मातादीन के प्रेम प्रसंगों के बहाने ब्राह्मणवादी शुचिता को पानी-पानी कर दिया है। सिलिया चमारिन पंडित दातादीन के बेटे मातादीन से फँसी हुई थी।एक दिन उसके पिता हरखू,माता,भाई और अन्य चमारों ने आकर मातादीन को घेर लिया।हरखू ने कहा-"तुम तो हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं।ब्राह्मण बना दो, हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है.........हमारी इज्जत लेते हो, तो अपना धरम भी दे दो।"(गोदान,पृष्ठ-208) अंततः हरखू की ललकार पर सभी चमार मातादीन को पकड़ कर उसका जनेऊ तोड़ देता हैऔर एक आदमी उसके मुँह में एक हड्डी का बड़ा सा टुकड़ा घुसेड़ देता है।असल में दलित चेतना की ऐसी धारदार अभिव्यक्ति पैदायशी दलित लेखकों की कृति में भी नहीं मिलती है।
बहरहाल, प्रेमचंद ने दलितों के संदर्भ में जो कुछ भी लिखा है, वह अपने समकालीन साहित्यकारों से आगे बढ़कर लिखा है। आज दलित चेतना के उभार के इस जमाने में भी यदि दलित रचनाकारों की सोच और दृष्टि व्यापक हुई है, तो यह समय और समाज के अनुरूप मूल्यों का विकास है। अतः कतिपय सीमाओं के बावजूद प्रेमचंद दलित चेतना के संदर्भ में प्रासंगिक बने हुए हैं।
उमेश कुमार शर्मा
हिन्दी लेखक/ब्लागर
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