तुमने हमें घर से धकेल दिया
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने हमें मंदिर से धकेल दिया
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने हमें इतिहास से धकेल दिया
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने ही बोया नफरतों बीज मनुस्मृति में
शंबूक की हत्या तुमने की
तुमने ही काटा एकलव्य का अंगूठा
तुमने ही मांगा कर्ण का कुंडल और कवच
समाज को तोड़ना मकसद नहीं है मेरा
हम तो बस तुमसे तुम्हारे करतूतों का
हिसाब मांगते हैं ।
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने हमें मंदिर से धकेल दिया
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने हमें इतिहास से धकेल दिया
हमने कुछ नहीं कहा
तुमने ही बोया नफरतों बीज मनुस्मृति में
शंबूक की हत्या तुमने की
तुमने ही काटा एकलव्य का अंगूठा
तुमने ही मांगा कर्ण का कुंडल और कवच
समाज को तोड़ना मकसद नहीं है मेरा
हम तो बस तुमसे तुम्हारे करतूतों का
हिसाब मांगते हैं ।
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