मुझे खेद है कि मैं उसी समाज का हूँ जो अपनी आधी आबादी के प्रति असंवेदनशील, क्रूर और हिंसक है। मैं उसी समाज का हूँ, जहाँ नारियों के प्रति उपभोक्तावादी और वस्तुवादी दृष्टिकोण है। मैं वहीं का वासी हूँ, जहाँ 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता' कहने भर की बात रह गयी है। आये दिन बेटियों के साथ हो रहे जघन्य अपराध के लिये शर्मिंदा हूँ। और सोचने पर मजबूर हूँ कि क्या सही में यह समाज कभी नारियों के प्रति पूज्य भाव रखता होगा ? अगर यह सत्य है तो फिर भारतीय वांगमय क्यों नारियों के शोषण से भरा पड़ा है। आज की पीढ़ी को विरासत में मिली है अपनी पुत्री सरस्वती के साथ ब्रह्मा की कामुकता। सीता के सतीत्व पर संदेह और भरी सभा में उनकी अग्नि परीक्षा। भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण। धोखे के साथ अहिल्या का मानहरण और पति के द्वारा पत्थर बन जाने का श्राप आदि-आदि।
भारतीय समाज, संस्कृति और सभ्यता के साथ साहित्य भी पुरुषवाद से ग्रसित है। ' यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली व्यवस्था है। पुरुषों के हाथ में शक्ति थी, सत्ता थी और सामर्थ्य था तो उन्होंनें स्वयं को कर्ता,नायक,रक्षक और देवता तक बना डाला। स्त्रियों दासी और सेविका बनकर रह गयी। आज स्त्रियों के खून में यह संचरित होने लगा कि वह कमज़ोर है, उन्हें अपनी रक्षा के लिए एक पुरुष चाहिए। सेवा ही उनका परम् कर्म है। पति के प्रति समर्पण ही उनकी नियति है। सतीत्व ही उनका परम् धर्म है। मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि शिक्षित स्त्रियों में भी यह भक्ति भावना क्यों है? वह समता, स्वतंत्रता और बंधुता के लिए संघर्ष के बजाय 'पति देवो भव' के मकड़जाल में क्यों फँसी हुई है?
जन्म के पूर्व से ही परिवार बेटियों के प्रति असंवेदनशील रहता है और इसमें पुरुष से ज्यादा स्त्री का योगदान है। गर्भस्त शिशु के लिंग जाँच के लिए माँ, दादी और नानी ज्यादा उत्सुक रहती हैं। भारत के घरों में जहाँ कोई नारी गर्भवती होती है, उसके कमरे में केवल क्यूट लड़के की तस्वीरें लगायी जाती हैं, बेटियों की नहीं। एक माँ जो स्वयं स्त्री है, पुत्रवती होने के लिये ललायित रहती हैं। और घर के बड़े-बुजुर्गों से पुत्रवती होने का आशीर्वाद पाकर प्रसन्न होती है। कोई अगर उन्हें पुत्रीवती होने का आशीर्वाद दे तो उसे वह श्राप ही समझेगी। आकड़े बताते हैं कि बेटे और बेटियों में भेद-भाव माँ ज्यादा करती हैं, अपेक्षाकृत पिता के।
सबकी बात सहकर जीने का उपदेश माताएँ देती हैं। बेटियों को ठोक-पीट कर कमजोर माँ बनाती हैं। खैर माँ को कटघरे में खड़ा करना ध्येय नहीं है मेरा। मैं यहाँ इतना कह सकता हूँ कि माताएँ बेटियों को परी नहीं शेरनी बनाएँ, जो सर्वत्र अपनी रक्षा में समर्थ हो।
आज स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है- अशिक्षा, सोच की संकीर्णता, जड़वत् मान्यताओं के प्रति आसक्ति, सतीत्व की रक्षा का भाव तथा आर्थिक विपन्नता।और सभी समस्याओं की जड़ अशिक्षा है।
एक अशिक्षित स्त्री अपने शोषण को जीवनपर्यन्त नियति समझकर चुप रहती है। यही चुप्पी एक परंपरा बन जाती है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर जीवन साथी चुनने तक में परिवार का हस्तक्षेप होता है। इससे अच्छा तो पहले की सामाजिक परंपरा थी, जिसमें स्त्री अपने पसंद के पुरुष को वरमाला पहनाकर पति रूप में स्वीकार करती थी। वर्तमान समय में लाख प्रगतिशील हो गया हो समाज, पर वह स्त्री के संदर्भ में अपनी संकीर्णता से मुक्त नहीं हो सका है। विवाह के संदर्भ में तो और भी नहीं। भारतीय समाज में विवाह को धार्मिक अनुष्ठान कहकर भ्रांतियाँ फैलायी गयी। विवाह दो हृदय का मिलन न होकर दो वासनाभिभूत स्त्री- पुरुष का संसर्ग मात्र है। यहाँ प्रेम की नींव पर विवाह का आयोजन नहीं किया जा रहा है, वरन् विवाह के माध्यम से प्रेम को उत्पन्न किया जा रहा है। स्त्री वैसे पुरुष के साथ जीवन बिताने के लिए अभिसप्त है, जो उसे फूटी नजर से पसंद नहीं। मैं पूछता हूँ कि विवाह के क्रम में स्त्री की इच्छाओं का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है? पिता अपनी लाडली को सबकुछ उसके पसंद का देते हैं, पर वर अपने पसंद का देते हैं।
हमें उस दिन का इंतजार है,जब स्त्री को समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग नहीं करनी होगी। पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था का नाश होगा तथा सभी स्तरों पर समतामूलक समाज की स्थापना होगी।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
भारतीय समाज, संस्कृति और सभ्यता के साथ साहित्य भी पुरुषवाद से ग्रसित है। ' यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली व्यवस्था है। पुरुषों के हाथ में शक्ति थी, सत्ता थी और सामर्थ्य था तो उन्होंनें स्वयं को कर्ता,नायक,रक्षक और देवता तक बना डाला। स्त्रियों दासी और सेविका बनकर रह गयी। आज स्त्रियों के खून में यह संचरित होने लगा कि वह कमज़ोर है, उन्हें अपनी रक्षा के लिए एक पुरुष चाहिए। सेवा ही उनका परम् कर्म है। पति के प्रति समर्पण ही उनकी नियति है। सतीत्व ही उनका परम् धर्म है। मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि शिक्षित स्त्रियों में भी यह भक्ति भावना क्यों है? वह समता, स्वतंत्रता और बंधुता के लिए संघर्ष के बजाय 'पति देवो भव' के मकड़जाल में क्यों फँसी हुई है?
जन्म के पूर्व से ही परिवार बेटियों के प्रति असंवेदनशील रहता है और इसमें पुरुष से ज्यादा स्त्री का योगदान है। गर्भस्त शिशु के लिंग जाँच के लिए माँ, दादी और नानी ज्यादा उत्सुक रहती हैं। भारत के घरों में जहाँ कोई नारी गर्भवती होती है, उसके कमरे में केवल क्यूट लड़के की तस्वीरें लगायी जाती हैं, बेटियों की नहीं। एक माँ जो स्वयं स्त्री है, पुत्रवती होने के लिये ललायित रहती हैं। और घर के बड़े-बुजुर्गों से पुत्रवती होने का आशीर्वाद पाकर प्रसन्न होती है। कोई अगर उन्हें पुत्रीवती होने का आशीर्वाद दे तो उसे वह श्राप ही समझेगी। आकड़े बताते हैं कि बेटे और बेटियों में भेद-भाव माँ ज्यादा करती हैं, अपेक्षाकृत पिता के।
सबकी बात सहकर जीने का उपदेश माताएँ देती हैं। बेटियों को ठोक-पीट कर कमजोर माँ बनाती हैं। खैर माँ को कटघरे में खड़ा करना ध्येय नहीं है मेरा। मैं यहाँ इतना कह सकता हूँ कि माताएँ बेटियों को परी नहीं शेरनी बनाएँ, जो सर्वत्र अपनी रक्षा में समर्थ हो।
आज स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है- अशिक्षा, सोच की संकीर्णता, जड़वत् मान्यताओं के प्रति आसक्ति, सतीत्व की रक्षा का भाव तथा आर्थिक विपन्नता।और सभी समस्याओं की जड़ अशिक्षा है।
एक अशिक्षित स्त्री अपने शोषण को जीवनपर्यन्त नियति समझकर चुप रहती है। यही चुप्पी एक परंपरा बन जाती है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर जीवन साथी चुनने तक में परिवार का हस्तक्षेप होता है। इससे अच्छा तो पहले की सामाजिक परंपरा थी, जिसमें स्त्री अपने पसंद के पुरुष को वरमाला पहनाकर पति रूप में स्वीकार करती थी। वर्तमान समय में लाख प्रगतिशील हो गया हो समाज, पर वह स्त्री के संदर्भ में अपनी संकीर्णता से मुक्त नहीं हो सका है। विवाह के संदर्भ में तो और भी नहीं। भारतीय समाज में विवाह को धार्मिक अनुष्ठान कहकर भ्रांतियाँ फैलायी गयी। विवाह दो हृदय का मिलन न होकर दो वासनाभिभूत स्त्री- पुरुष का संसर्ग मात्र है। यहाँ प्रेम की नींव पर विवाह का आयोजन नहीं किया जा रहा है, वरन् विवाह के माध्यम से प्रेम को उत्पन्न किया जा रहा है। स्त्री वैसे पुरुष के साथ जीवन बिताने के लिए अभिसप्त है, जो उसे फूटी नजर से पसंद नहीं। मैं पूछता हूँ कि विवाह के क्रम में स्त्री की इच्छाओं का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है? पिता अपनी लाडली को सबकुछ उसके पसंद का देते हैं, पर वर अपने पसंद का देते हैं।
हमें उस दिन का इंतजार है,जब स्त्री को समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग नहीं करनी होगी। पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था का नाश होगा तथा सभी स्तरों पर समतामूलक समाज की स्थापना होगी।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
0 Comments:
Post a Comment