अब वे भी उठाने लगे हैं आवाज़
जो मूक-दर्शक बने थे, अब तक
जिनकी काट ली गई थी जुबान,
इंसानियत को दरकिनार कर।
अब उनके भी भाव लेने लगे हैं आकार,
जिन्हें समाज ने नकारा सदियों से
अब वंचितों के हाथ भी हैं कलम
अब वे भी मांग रहे हैं अधिकार।
अब चुप नहीं बैठ सकते हैं कामगार
सुलग उठी है सदियों की सोयी आग
अभिव्यक्ति के खतरे उठाने लगे हैं वे लोग
खतरों से खेलना जिनकी नियति है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
जो मूक-दर्शक बने थे, अब तक
जिनकी काट ली गई थी जुबान,
इंसानियत को दरकिनार कर।
अब उनके भी भाव लेने लगे हैं आकार,
जिन्हें समाज ने नकारा सदियों से
अब वंचितों के हाथ भी हैं कलम
अब वे भी मांग रहे हैं अधिकार।
अब चुप नहीं बैठ सकते हैं कामगार
सुलग उठी है सदियों की सोयी आग
अभिव्यक्ति के खतरे उठाने लगे हैं वे लोग
खतरों से खेलना जिनकी नियति है।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
0 Comments:
Post a Comment