टिपण्णी :-
(1) उधो! मन नाही दस बीस।
उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश सूरदास रचित 'सूरसागर' के भ्रमरगीत प्रसंग से प्रणीत है, जिसका संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'भ्रमरगीत सार' नाम से किया है। इस संदर्भ के माध्यम से प्रेम की एकनिष्ठता प्रतिपादित की गई है। जिस समय श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं का परित्याग कर मथुरा में वास करने लगे और अपने सखा उद्धव को गोकुल भेजकर निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने लगे। उसी समय गोपिकाओं ने कृष्ण तथा उद्धवजी दोनों को उपालंभ देती हुई कहने लगी कि हे उधो! हमारे पास तुम लोगों के समान दस बीस मन नहीं है कि एक ओर कृष्ण से भी प्रेम करें और दूसरी ओर निर्गुण ब्रह्म की उपासना भी करें। प्रकारांतर से वह कहना चाहती है कि तुम और तुम्हारे कृष्ण एकनिष्ठ प्रेम को क्या समझेंगे।
सूर रचित यह पद्यांश वर्तमान समय में और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है, जब प्रेम ने व्यापार का रूप ले लिया है। इसमें भी लोग नफा-नुकसान खोजने लगे हैं।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
(1) उधो! मन नाही दस बीस।
उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश सूरदास रचित 'सूरसागर' के भ्रमरगीत प्रसंग से प्रणीत है, जिसका संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'भ्रमरगीत सार' नाम से किया है। इस संदर्भ के माध्यम से प्रेम की एकनिष्ठता प्रतिपादित की गई है। जिस समय श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं का परित्याग कर मथुरा में वास करने लगे और अपने सखा उद्धव को गोकुल भेजकर निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने लगे। उसी समय गोपिकाओं ने कृष्ण तथा उद्धवजी दोनों को उपालंभ देती हुई कहने लगी कि हे उधो! हमारे पास तुम लोगों के समान दस बीस मन नहीं है कि एक ओर कृष्ण से भी प्रेम करें और दूसरी ओर निर्गुण ब्रह्म की उपासना भी करें। प्रकारांतर से वह कहना चाहती है कि तुम और तुम्हारे कृष्ण एकनिष्ठ प्रेम को क्या समझेंगे।
सूर रचित यह पद्यांश वर्तमान समय में और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है, जब प्रेम ने व्यापार का रूप ले लिया है। इसमें भी लोग नफा-नुकसान खोजने लगे हैं।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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