(1) 'कठिन काव्य का प्रेत'
उत्तर :- इस कथन का प्रयोग आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के प्रथम कवि केशवदास के लिए किया है। केशवदास ने रीतिकालीन परिपाटी के अनुसार काव्य रचना के क्रम में भाव के स्थान पर शिल्प पर जोर दिया है। बातें क्या कहनी है, इससे ज्यादा जोर उस बात पर दिया गया कि बातें कैसे कहनी है? और केशवदास इसके अपवाद नहीं थे। वे 'कविप्रिया' में अलंकार तथा 'रसिकप्रिया' में रस के लक्षणों पर विचार करते हुए अपनी मौलिक कविताएँ उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहाँ तक केशवदास ठीक हैं, किन्तु जब वे गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' की प्रतिद्वंद्विता में 'श्रीरामचन्द्रचन्द्रिका' की रचना कर रहे थे तो उन्हें छंदों, रसों और अलंकारों का जाल नहीं बुनना चाहिए। राम काव्य लिखने के लिए जिस प्रकार के हृदय की जरुरत थी, केशवदास उसपर कसौटी पर विफल हो गये। इसी संदर्भ में आचार्य शुक्ल ने कहा है कि कवि होने के लिए जिस प्रकार के हृदय की आवश्यकता होती है, वह केशव के पास नहीं था। अतएव वे कठिन काव्य के प्रेत हैं।
डॉ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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