कंक्रीटों के जंगल में खरा है मेरा गाँव
कितना घुंट रहा है चंद साँसों के लिए
अब यह कूड़ेदान है बस शहर के लिए
जहाँ लोग केवल कूड़ा उलटने आते हैं।
कितना ठूंठ हो गया यह बूढ़ा बरगद
कितनी बौनी हो गयी है प्यारी नदियाँ
कहाँ खो गया मेरे बचपन का स्कूल,
यहाँ तो अब विदेशी शराब खाना है,
किताबों की दुकान पर मिल रहे हैं चखने
यहाँ प्रार्थना की जगह है गालियाँ की गूँज।
खेतों से होकर बह रहा है काला पानी
बदबूदार,जो फैक्ट्री से होकर आता है
सूख रहे हैं-बबूल,शीसम,पाखड़ के पेड़
खुश है जमीन के ठेकेदार, मर रहे हैं
फटेहाल किसान,युवाओं में है बेरोजगार
फैशन के इस जमाने में नष्ट है संस्कार
मिट रहा है गाँव,पर बढ़ रहा है कारोबार
मिट रहा है गाँव,पर बढ़ रहा है कारोबार।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
कितना घुंट रहा है चंद साँसों के लिए
अब यह कूड़ेदान है बस शहर के लिए
जहाँ लोग केवल कूड़ा उलटने आते हैं।
कितना ठूंठ हो गया यह बूढ़ा बरगद
कितनी बौनी हो गयी है प्यारी नदियाँ
कहाँ खो गया मेरे बचपन का स्कूल,
यहाँ तो अब विदेशी शराब खाना है,
किताबों की दुकान पर मिल रहे हैं चखने
यहाँ प्रार्थना की जगह है गालियाँ की गूँज।
खेतों से होकर बह रहा है काला पानी
बदबूदार,जो फैक्ट्री से होकर आता है
सूख रहे हैं-बबूल,शीसम,पाखड़ के पेड़
खुश है जमीन के ठेकेदार, मर रहे हैं
फटेहाल किसान,युवाओं में है बेरोजगार
फैशन के इस जमाने में नष्ट है संस्कार
मिट रहा है गाँव,पर बढ़ रहा है कारोबार
मिट रहा है गाँव,पर बढ़ रहा है कारोबार।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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