लौट आता हूँ
देर शाम थक-हारकर वहीं,
जहाँ से कह के निकला था कि
अब न लौटूंगा कभी,
चाहे कुछ हो जाए
भटक जाऊंगा कहीं
वीरान जंगलों में
या लुढ़क जाऊंगा
किसी गहरे नाले में
बह जाऊंगा किसी
नदी की धारा के साथ
या खाकर मर जाऊंगा
जहर किसी अनजान गली में।
लेकिन.....लेकिन लौट आता हूँ
देर शाम वहीं कि कहीं
अपनों की भीड़ में
अकेली न हो जाए
मेरी वृद्धा पत्नी
मैं लौट आता हूँ देर शाम
खोजने दंतुरित मुस्कान
अपने बेटे-बेटियों में
जिसे देखने भाग आता
अक्सर लंच के बहाने।
लौट आता कि शायद
अब भी....अब भी
उनको मेरी जरूरत हो।
बूढ़ा बाप हूँ घर का
बूढ़ा बैल ही सही
जुत जाऊंगा आज भी
अपनी रोटी पानी के लिए
कोई प्यार से कहे तो जरा।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
देर शाम थक-हारकर वहीं,
जहाँ से कह के निकला था कि
अब न लौटूंगा कभी,
चाहे कुछ हो जाए
भटक जाऊंगा कहीं
वीरान जंगलों में
या लुढ़क जाऊंगा
किसी गहरे नाले में
बह जाऊंगा किसी
नदी की धारा के साथ
या खाकर मर जाऊंगा
जहर किसी अनजान गली में।
लेकिन.....लेकिन लौट आता हूँ
देर शाम वहीं कि कहीं
अपनों की भीड़ में
अकेली न हो जाए
मेरी वृद्धा पत्नी
मैं लौट आता हूँ देर शाम
खोजने दंतुरित मुस्कान
अपने बेटे-बेटियों में
जिसे देखने भाग आता
अक्सर लंच के बहाने।
लौट आता कि शायद
अब भी....अब भी
उनको मेरी जरूरत हो।
बूढ़ा बाप हूँ घर का
बूढ़ा बैल ही सही
जुत जाऊंगा आज भी
अपनी रोटी पानी के लिए
कोई प्यार से कहे तो जरा।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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