कहानी
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राजकीय मध्य विद्यालय के सारे बच्चे सुबह - सुबह हाथ में तिरंगा लिए प्रभात फेरी के लिए निकल पड़े थे ।वे नारे लगा रहे थे -"इनकलाब जिन्दाबाद ......जिन्दाबाद ....जिन्दाबाद ....।जो हमसे टकराएगा .....चूर-चूर हो जाएगा ।" ऐसा जोश ,ऐसा उत्साह कि मानो देश को अभी -अभी आजादी मिली हो ।
इन बच्चों के साथ भोला भी सम्मिलित था ।उसका ड्रेस मटमैला था ,जिसमें कई जगह स्याही और चाय के दाग लगे थे, परंतु उनकी आवाज सबसे ऊँची थी। दीपु के साथ वह परेड का प्रतिनिधित्व कर रहा था।भले ही वह एक चाय की दुकान में सात सौ की नौकरी कर रहा था ,एक साल से स्कूल जाना बंद था , लेकिन उसके भीतर से स्कूल निकला नहीं था । उसे लग रहा था कि एक दिन देश को पूरी आजादी मिलेगी ...किसान ,मजदूर ,कामगार सब आजाद होंगे .....माँ जेल से छूटकर आएगी....वह फिर से स्कूल जाएगा ।
लोग कहते हैं कि उनकी माँ हत्यारिन है ...उसने भट्ठा मालिक जुगेसर का गला रेत दिया -जिस थाली में खाती थी ,उसी में छेद । माँ पर जुगेसर की बुरी नजर थी ।वह उसे पाना चाहता था ,लेकिन पापा दूध में नमक थे , इसलिए जुगेसर ने उन्हें जलती भट्ठी में धकेल दिया ,तब से माँ कामरेड हो गयी ।लाल झंडा वाले श्यामू सदा से मिलने लगी और लाल सलाम का नारा लगाने लगी ।लोगों का मानना है कि जुगेसर की हत्या के उसे श्यामू ने उकसाया ।
आठ बज गये थे , सारे बच्चे परेड से वापस होकर स्कूल के मैदान में कतारबद्ध हो गये ।भोला और दीपू सबसे आगे जाकर गाना शुरु किया-"सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा ।"
दीपू की आवाज में जोश था, उत्साह था , परंतु भोला ठंढ़ा पर गया था ।उसे लग रहा था कि हिन्दोस्ता सारे जहां से अच्छा तब होगा ,जब उनकी माँ जेल से घर आएगी .......वह स्कूल जाएगा ।
राष्ट्रध्वज फहराने की पूरी तैयारी हो गयी थी ।शिक्षकगण सज-धज कखड़े थे ,तभी हेडमास्टर साहब ने रस्सी तान दी ।तिरंगा लहराने लगा और साथ ही ' जन गण मन ' का स्वरघोष सबके हृदय को भावविभोर कर दिया ।शिक्षकों ने टाफियाँ बाँटी , इसी के साथ सभा विसर्जन ।सभी अपने - अपने घर की ओर चल पड़े ।भोला भी तिरंगा लहराते हुए दुकान की ओर चल पड़ा ।उनकी आँखों में आजाद भारत सपने झिलमिला रहे थे ....स्वतंत्र होने का भाव ऊफान मार रहा था, जिसपर एक अज्ञात भय हावी था ।
भोला अभी दुकान पर पहुँचा ही था कि उसकी नजर मालिक पर पड़ी ।जूठे बरतनों का ढेर नल पर पड़ा था .....कपों पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं .....चाय के ग्राहक कुनमुना रहे थे ।भोला अपराधी भाव से मालिक के सामने गया ही था कि मालिक ने उसे पकड़कर तड़तड़ा दिया । लात और घुस्सों की बारिश ....गालियों की बौछार -"कहाँ गया था रे साला ...हरामी , बाप से मराने ।" मालिक का क्रोध सारी सीमाओं को लांघ गया -"इस्कूलिया छौरा के साथ इस्कूलिया बनता है साला ...झंडा फहराएगा ......तिरंगा ......आज सब झंडागिरी गाँड़ में घुसेड़ देंगे ।हरामी बही का पन्ना फाड़कर झंडा बनाता है ।"
बही की याद आते ही मालिक वेकाबू हो गया ।वह झंडे का डंटा तोड़कर भोला टर फिर से टूट पड़। भोला मुर्गी की तरह छटपटा रहा था और लोग तमाशा देख रहे थे ।अंत में वह औंधे मुँह गिर पड़ा मुँह से खून निकलने लगा ।खून धीरे -धीरे नीचे गिरे हुए तिरंगे पर फैलने लगा ।तिरंगा अब लाल हो गया ......अशोक चक्र उसमें उपलाने लगा ।भोला की आँखें खुलीं तो उसके सामने लाल झंडा था .....कामरेड श्यामू का लाल झंडा । उसके भीतर पता नहीं कहाँ से असीम शक्ति आ गयी ।वह पूरी ताकत बटोरकर उठा और मालिक की नाक पर एक जोरदार मुक्का मारा ।मालिक अपनी नाक थामकर वहीं बैठ गया ।लोग देखते रह गए और भोला लाल झंडा लहराते हुए लाल सलाम का नारा लगाया और कामरेड श्यामू की घर की ओर चल । उसके भीतर कामरेड ऊफान मार रहा था ।अब वह पूरी आजादी की तलाश में चल पड़ा था
उमेश कुमार शर्मा
हिन्दी लेखक
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