सूख गया धरती का आँचल
बूँद-बूँद जल गया पाताल ।
फट गयी किसान की छाती
हुए हैं नेता माला - माल ।।
सूखी फसलें ताक रही हैं
जैसे सिर के रूखे बाल ।
सूख गयी है ताल-तलैया
नदियाँ भी हो गयी बेहाल ।।
बादल जैसे रूठ गये हैं
बदल गई हवा की चाल।
धरकर हाथ माथ पर बैठे
करे भी क्या धरती के लाल ?
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
बूँद-बूँद जल गया पाताल ।
फट गयी किसान की छाती
हुए हैं नेता माला - माल ।।
सूखी फसलें ताक रही हैं
जैसे सिर के रूखे बाल ।
सूख गयी है ताल-तलैया
नदियाँ भी हो गयी बेहाल ।।
बादल जैसे रूठ गये हैं
बदल गई हवा की चाल।
धरकर हाथ माथ पर बैठे
करे भी क्या धरती के लाल ?
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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