भगवान्!
मैं तुम्हारे होने पर शक नहीं करता,
पर तुम्हारा बदला हुआ चरित्र
कुछ ठीक नहीं लगता
सुना है कि तुम आ गये थे
द्रौपदी की एक पुकार पर
और गज की एक चींख सुनकर
बिना पनही के ही,
तो अब क्यों नहीं आते
जब कोई तोड़ रहा होता है
तुम्हारा ही घर सोमनाथ
या अयोध्या वाला
या फिर निरीह भक्तों की
पुकार सुनकर,
जबकि बात उसके जान पर
बन आती है
या क्यों नहीं आते तब
जब कोई दुर्दांत सियार
कर रहा होता है शीलभंग
किसी स्त्री का!
आकर क्यों नहीं चीर देते
उसकी छाती
क्यों नहीं पी जाते खून!
क्या तुमने भी सीख ली है राजनीति
आज के नेताओं से
जो केवल चुनाव के समय
वोट मांगने आते हैं!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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