कविता : मकड़जाल में स्त्री
आपने कभी देखा है!
अपने ही बुने जाल में
उलझी हुई मकड़ियों को
महसूस किया है आपने
उसके भीतर की बेचैनी।
चूँकि मैंने देखा है
मकड़जाल में स्त्री को
मैंने महसूस किया है
उसके भीतर की बेचैनी!
जी हाँ! मैंने देखा है उसे
चक्की में साबूत पिसते हुए
हर दाने के साथ उबलते हुए
गर्म तबे पर जलते हुए
फिर से देखा है उसे रोज
नये-नये जाल बुनते हुए
अपने लिए.........
अपनी पीढ़ी के लिए.......
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लागर
संपर्क- 6201464897
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