लघुकथा
जाड़े की कँपकपाती हुई सुबह में कुहरे की गुहा को भेदते हुए एक- एक कर चार मैनें(एक प्रकार की चिड़िया) खेत में उतर आये। खेत में गेहूँ की डिभी मिट्टी की पतली परत को छेदते हुए बाहर निकल आये थे। कुछ कल उगे थे। कुछ आज। कुछ अभी संघर्ष कर रहे थे। खासकर जिनके माथे पर बड़े गोले आ पड़े थे, वे मूड़ी इधर- उधर कर बाहर आने की जुगाड़ में कछमछा रहे थे!
मैनों ने अपना काम शुरू कर दिया। वे नन्हीं-नन्हीं डिभी को उखाड़ कर उसके जड़ में लगे फूले हुए गेहूँ को चुगने लगे।
सोनू ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर उनकी ओर तान दिया, पर छोड़ा नहीं। वह चाहता तो अपने नुकीले तीरों से उन्हें मारकर वहीं टांग देता! फिर उनके जात वाले पूरी मंडली को लेकर आते और काँव-काँव....चाँय-चाँय करते हुए ऊपर ही उड़ते रह जाते! नीचे उतरने की हिम्मत न करते। और फिर खेत से आने छुट्टी!
पर वह देखता रहा।उनके काले- भूरे रंगों के पंख, सफेद पट्टी वाले काले- काले रंग की पूँछ। मटमैले रंग के माथे जो दूर से लग रहा था कि उसने ठंड से बचने के लिए कान में मफलर बांध रखा है। सोने के बने सुन्दर नुकीले चोंच और भौंहें आकर्षक लग रहे थे। उसने एक बार स्वयं को देखा। उसका भी चादर उसी रंग का-भूरे और मटमैले ,सफेद पट्टी वाला।बस उसके कान में मफलर नहीं था! तभी तो वह ठंड से बचने के लिए घास-फूस जलाकर ताप रहा था।
दो मैनें एकदम जवान दिख रहे थे। एक बूढ़े, जिसके सिर के कुछ बाल झड़ गए थे। एक बस उसी के उम्र का था, उसकी चोंच सबसे अधिक चमकदार था। मानो सोनार ने अभी-अभी खरे सोने से गढ़कर उसे दिया हो। उसके चादर और मफलर भी एकदम नये थे। सोनू ने मन-ही-मन हिसाब लगाया- दोनों जवान मैनें जरूर उनके माता-पिता होंगे। बूढ़े वाले दादा जी....फिर दादी....दादी क्यों नहीं आयी? शायद वह बीमार होगी! लगता है रात इसके घर भी उसी की तरह चूल्हा नहीं जला होगा! सभी भूखे सोये होंगे! तभी तो इतना सबेरे आ गए कि कुछ खाने- पीने को मिल जाए! भूखे न होते तो क्यों आते इस कँपकपाती हुई ठंड में? जैसे वह खुद बासी रोटी के लोभ में चिड़िया उड़ाने आया है! बासी रोटी!......रात भर रोटी के ही सपने आ रहे थे। मकई की बासी रोटी! मालकिन ने आज उसपर थोड़ा-सा साग और अचार का मसाला भी डाल दी थी! बगल में चुटकी भर नमक और उस पर चार बूँद सरसो तेल! वह कह रही थी- देखना एक भी चिड़िया खेत में न उतरे। दूर से देखते ही तीर चला देना। एकदम निशाने पर।
रोटी की सोंधी गंध, अचार के मसाले की खुशबू और सरसों तेल की झाँस..... मुँह में पानी भर आया! पौ फटते ही वह आँख मलते हुए तीर- धनुष लेकर दौड़ पड़ा। कहीं देर हो गयी तो मालकिन........रोटी....! जो शक था, वही हुआ। उसके आने में देर हो गयी थी! मालकिन ने रोटी गाय को खिला दी! साग, अचार सबका सब! बोली- पहले खेत से चिड़िया उड़ा कर आ, फिर रोटी मिलेगी।
सोनू अपने में डूबता ही जा रहा था कि किसी ने पीठ पर जोर का मुक्का मारा- "हरामखोर इधर मैनों ने पूरा खेत उजाड़ दिया और तूँ तमाशा देख रहा है।"
सोनू ने धनुष पर चढ़े हुए तीर को पूरी ताकत से तानकर निशाने पर चला दिया। मालिक को क्या पता था कि भूख कैसी होती है?
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार।
जाड़े की कँपकपाती हुई सुबह में कुहरे की गुहा को भेदते हुए एक- एक कर चार मैनें(एक प्रकार की चिड़िया) खेत में उतर आये। खेत में गेहूँ की डिभी मिट्टी की पतली परत को छेदते हुए बाहर निकल आये थे। कुछ कल उगे थे। कुछ आज। कुछ अभी संघर्ष कर रहे थे। खासकर जिनके माथे पर बड़े गोले आ पड़े थे, वे मूड़ी इधर- उधर कर बाहर आने की जुगाड़ में कछमछा रहे थे!
मैनों ने अपना काम शुरू कर दिया। वे नन्हीं-नन्हीं डिभी को उखाड़ कर उसके जड़ में लगे फूले हुए गेहूँ को चुगने लगे।
सोनू ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर उनकी ओर तान दिया, पर छोड़ा नहीं। वह चाहता तो अपने नुकीले तीरों से उन्हें मारकर वहीं टांग देता! फिर उनके जात वाले पूरी मंडली को लेकर आते और काँव-काँव....चाँय-चाँय करते हुए ऊपर ही उड़ते रह जाते! नीचे उतरने की हिम्मत न करते। और फिर खेत से आने छुट्टी!
पर वह देखता रहा।उनके काले- भूरे रंगों के पंख, सफेद पट्टी वाले काले- काले रंग की पूँछ। मटमैले रंग के माथे जो दूर से लग रहा था कि उसने ठंड से बचने के लिए कान में मफलर बांध रखा है। सोने के बने सुन्दर नुकीले चोंच और भौंहें आकर्षक लग रहे थे। उसने एक बार स्वयं को देखा। उसका भी चादर उसी रंग का-भूरे और मटमैले ,सफेद पट्टी वाला।बस उसके कान में मफलर नहीं था! तभी तो वह ठंड से बचने के लिए घास-फूस जलाकर ताप रहा था।
दो मैनें एकदम जवान दिख रहे थे। एक बूढ़े, जिसके सिर के कुछ बाल झड़ गए थे। एक बस उसी के उम्र का था, उसकी चोंच सबसे अधिक चमकदार था। मानो सोनार ने अभी-अभी खरे सोने से गढ़कर उसे दिया हो। उसके चादर और मफलर भी एकदम नये थे। सोनू ने मन-ही-मन हिसाब लगाया- दोनों जवान मैनें जरूर उनके माता-पिता होंगे। बूढ़े वाले दादा जी....फिर दादी....दादी क्यों नहीं आयी? शायद वह बीमार होगी! लगता है रात इसके घर भी उसी की तरह चूल्हा नहीं जला होगा! सभी भूखे सोये होंगे! तभी तो इतना सबेरे आ गए कि कुछ खाने- पीने को मिल जाए! भूखे न होते तो क्यों आते इस कँपकपाती हुई ठंड में? जैसे वह खुद बासी रोटी के लोभ में चिड़िया उड़ाने आया है! बासी रोटी!......रात भर रोटी के ही सपने आ रहे थे। मकई की बासी रोटी! मालकिन ने आज उसपर थोड़ा-सा साग और अचार का मसाला भी डाल दी थी! बगल में चुटकी भर नमक और उस पर चार बूँद सरसो तेल! वह कह रही थी- देखना एक भी चिड़िया खेत में न उतरे। दूर से देखते ही तीर चला देना। एकदम निशाने पर।
रोटी की सोंधी गंध, अचार के मसाले की खुशबू और सरसों तेल की झाँस..... मुँह में पानी भर आया! पौ फटते ही वह आँख मलते हुए तीर- धनुष लेकर दौड़ पड़ा। कहीं देर हो गयी तो मालकिन........रोटी....! जो शक था, वही हुआ। उसके आने में देर हो गयी थी! मालकिन ने रोटी गाय को खिला दी! साग, अचार सबका सब! बोली- पहले खेत से चिड़िया उड़ा कर आ, फिर रोटी मिलेगी।
सोनू अपने में डूबता ही जा रहा था कि किसी ने पीठ पर जोर का मुक्का मारा- "हरामखोर इधर मैनों ने पूरा खेत उजाड़ दिया और तूँ तमाशा देख रहा है।"
सोनू ने धनुष पर चढ़े हुए तीर को पूरी ताकत से तानकर निशाने पर चला दिया। मालिक को क्या पता था कि भूख कैसी होती है?
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार।
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