कुछ सवाल
मेरे मन में उठते हैं
अक्सर कुछ सवाल
कि क्या वे भी जलाते होंगे अगरबत्तियाँ
जो रोज़ खुशबू रचते हैं,
या यूँ ही महकता होगा
उनका घर -आंगन!
क्या वे भी खाते होंगे अन्न
जो रोज़ खेत जीतते हैं,
उगाते हैं फसलें
या यूँ ही भर जाता होगा
उनका मन!
क्या वे भी पीते होंगे दूध
जो रोज चराते हैं गाय
दूहते हैं दूध
या यूँ ही भर जाता होगा
उनका मन!
क्या वे भी पहनते होंगे कपड़े
जो रोज कपड़े बुनते हैं
या यूँ ही ढक जाता होगा
उनका तन!
क्या वे भी पूजते होंगे भगवान्
जो रोज उन्हें गढ़ते हैं
या यूँ ही पूरा होता होगा
उनका मन!
हो सकता है
कि ये सवाल बचकाने हो,
पर मैंने देखा
शहर के पीछे की महकती बस्तियाँ!
भूखों मरते हुए किसान!
कुपोषित चरवाहे!
नंगे बुनकर!
फटेहाल कुंभकार,
जो ईश्वर को रचते हैं!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा(बिहार)
मेरे मन में उठते हैं
अक्सर कुछ सवाल
कि क्या वे भी जलाते होंगे अगरबत्तियाँ
जो रोज़ खुशबू रचते हैं,
या यूँ ही महकता होगा
उनका घर -आंगन!
क्या वे भी खाते होंगे अन्न
जो रोज़ खेत जीतते हैं,
उगाते हैं फसलें
या यूँ ही भर जाता होगा
उनका मन!
क्या वे भी पीते होंगे दूध
जो रोज चराते हैं गाय
दूहते हैं दूध
या यूँ ही भर जाता होगा
उनका मन!
क्या वे भी पहनते होंगे कपड़े
जो रोज कपड़े बुनते हैं
या यूँ ही ढक जाता होगा
उनका तन!
क्या वे भी पूजते होंगे भगवान्
जो रोज उन्हें गढ़ते हैं
या यूँ ही पूरा होता होगा
उनका मन!
हो सकता है
कि ये सवाल बचकाने हो,
पर मैंने देखा
शहर के पीछे की महकती बस्तियाँ!
भूखों मरते हुए किसान!
कुपोषित चरवाहे!
नंगे बुनकर!
फटेहाल कुंभकार,
जो ईश्वर को रचते हैं!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा(बिहार)
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