पता नहीं!
कितना सत्य है
डार्विन का 'विकासवादी सिद्धांत'
कि मानव का विकास हुआ पशुओं से(बंदरों से)
झड़ गयी हमारी पूँछ
होने लगे खड़े दो पैरों पर
फिर हम करते गये यात्रा
विकास के पथ पर उत्तरोत्तर
यात्रा :
नग्नता से सभ्यता की ओर
पशुता से मानवता की ओर
अज्ञानता से विज्ञता की ओर
जड़ता से सूक्ष्मता की ओर
लेकिन फिर यह कैसी यात्रा :
सभ्यता से नग्नता की ओर
विज्ञता से अज्ञानता की ओर
मानवता से पशुता की ओर
सूक्ष्मता से जड़ता की ओर!
क्या जाग गया है पुनः
हमारे भीतर का पशु
हम पीने लगे हैं खून
अपने ही भाइयों का
लूटने लगे हैं आबरू स्त्री का
संबंध हो गये तार- तार
घर भी , बाहर भी!
क्या हम इन हजारों वर्षों में
केवल नग्नता से चलकर
नग्नता तक पहुँचे हैं?
क्या बस, पूँछ का उगना बाँकी है???
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
कितना सत्य है
डार्विन का 'विकासवादी सिद्धांत'
कि मानव का विकास हुआ पशुओं से(बंदरों से)
झड़ गयी हमारी पूँछ
होने लगे खड़े दो पैरों पर
फिर हम करते गये यात्रा
विकास के पथ पर उत्तरोत्तर
यात्रा :
नग्नता से सभ्यता की ओर
पशुता से मानवता की ओर
अज्ञानता से विज्ञता की ओर
जड़ता से सूक्ष्मता की ओर
लेकिन फिर यह कैसी यात्रा :
सभ्यता से नग्नता की ओर
विज्ञता से अज्ञानता की ओर
मानवता से पशुता की ओर
सूक्ष्मता से जड़ता की ओर!
क्या जाग गया है पुनः
हमारे भीतर का पशु
हम पीने लगे हैं खून
अपने ही भाइयों का
लूटने लगे हैं आबरू स्त्री का
संबंध हो गये तार- तार
घर भी , बाहर भी!
क्या हम इन हजारों वर्षों में
केवल नग्नता से चलकर
नग्नता तक पहुँचे हैं?
क्या बस, पूँछ का उगना बाँकी है???
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
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