आजादी,
कोई नन्हीं- सी, प्यारी-सी
अबोध-सी बच्ची नहीं है,
वह उछलती- कूदती बाला भी नहीं,
वह किसी को लुभाने वाली स्त्री भी नहीं है,
वह तो सत्तर पार की एक बूढ़ी औरत है,
जिसके हाथ में एक लाठी है!
लाठी, देश को बचाने के लिए नहीं,
कुछ दिन और सहूलियत से जीने के लिए है !
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
कोई नन्हीं- सी, प्यारी-सी
अबोध-सी बच्ची नहीं है,
वह उछलती- कूदती बाला भी नहीं,
वह किसी को लुभाने वाली स्त्री भी नहीं है,
वह तो सत्तर पार की एक बूढ़ी औरत है,
जिसके हाथ में एक लाठी है!
लाठी, देश को बचाने के लिए नहीं,
कुछ दिन और सहूलियत से जीने के लिए है !
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
Good
ReplyDeleteजी
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