आदमी के फर्में में
फिट नहीं आता कोई आदमी
लाख कोशिश कर लूँ
पर निकल ही जाता है
फ़र्में से बाहर
कभी उसके पैर
कभी उसके हाथ
कभी उसके बाल या उसकी दाढ़ी,
मूँछें, टीकी, टीका, जनेऊ, पगड़ी, टोपी
या फ़िर पूँछ या लिंग,
पर मेरी भी ज़िद है
कि मैं उसे समेटकर
आदमी के फर्में में फिट करने की
नाकाम कोशिश में लगा हूँ।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
फिट नहीं आता कोई आदमी
लाख कोशिश कर लूँ
पर निकल ही जाता है
फ़र्में से बाहर
कभी उसके पैर
कभी उसके हाथ
कभी उसके बाल या उसकी दाढ़ी,
मूँछें, टीकी, टीका, जनेऊ, पगड़ी, टोपी
या फ़िर पूँछ या लिंग,
पर मेरी भी ज़िद है
कि मैं उसे समेटकर
आदमी के फर्में में फिट करने की
नाकाम कोशिश में लगा हूँ।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
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