कौन कहता है
कि अब तुम याद नहीं आते
कौन कहता है
कि हमारी स्मृति में,
हमारी कृति में,
तुम नहीं हो!
तुम्हीं तो थे जो जान लेते थे
मेरे मन की बात, बिन बताए ही,
तुम्हीं तो थे जो सुन लेते थे
मेरे मन का संगीत, बिन गाए ही
तुम्हीं तो थे जो स्वयं को तोड़ कर
मुझे रचा था, जग के लिए
तुम्हीं तो थे जो पी जाते थे
मेरे भीतर का जहर, कि मैं अमृत हो सकूँ
फिर कैसे हो सकता हूँ मैं इतना कृतघ्न
कि तुम्हें नीलकंठ भी न कह सकूँ!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार।
कि अब तुम याद नहीं आते
कौन कहता है
कि हमारी स्मृति में,
हमारी कृति में,
तुम नहीं हो!
तुम्हीं तो थे जो जान लेते थे
मेरे मन की बात, बिन बताए ही,
तुम्हीं तो थे जो सुन लेते थे
मेरे मन का संगीत, बिन गाए ही
तुम्हीं तो थे जो स्वयं को तोड़ कर
मुझे रचा था, जग के लिए
तुम्हीं तो थे जो पी जाते थे
मेरे भीतर का जहर, कि मैं अमृत हो सकूँ
फिर कैसे हो सकता हूँ मैं इतना कृतघ्न
कि तुम्हें नीलकंठ भी न कह सकूँ!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार।
0 Comments:
Post a Comment