'कल' कितना सुखकर होता है,
जिसपर आज का बोझ लादकर
हम निश्चिन्त हो जाते हैं।
आज के भारी से भारी बोझ को
उठा लेने में समर्थ होता है कल
कल की उम्मीद :
भूखों का भूख हर लेता है
प्यासे के कंठ को सिक्त कर देता है
दर्द वाले का दर्द सोंख लेता है और
सबमें जीने की उम्मीद जगाता है कल
लेकिन मेरी चिंता है उस कल के लिए
जिसका कोई कल नहीं होगा!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा,बिहार।
जिसपर आज का बोझ लादकर
हम निश्चिन्त हो जाते हैं।
आज के भारी से भारी बोझ को
उठा लेने में समर्थ होता है कल
कल की उम्मीद :
भूखों का भूख हर लेता है
प्यासे के कंठ को सिक्त कर देता है
दर्द वाले का दर्द सोंख लेता है और
सबमें जीने की उम्मीद जगाता है कल
लेकिन मेरी चिंता है उस कल के लिए
जिसका कोई कल नहीं होगा!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा,बिहार।
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