तुम हमारे अंतस में हो
तुम्हारे जीवन की अनंत
रश्मियों से ज्योतित हैं हम
तुम्हारे स्नेह से सिंचित हैं हम
तुम्हारा प्रेम बसा है हममें
तुम हम में हो, पर बेनाम।
तुम्हारे रूप से आसक्ति है
तुम्हारे चरित्र से भक्ति है
तुम्हारे स्पर्श ने रचा है हमें
तुम्हारे रस ने सिंचा है हमें
तुम्हारे गंध ने जोड़ा है हमें
सुरम्य सृष्टि से, इस जगती से
फिर भी तुम अनाम हो
फिर भी तुम अशब्द हो,
पर तुम हो,और हम तुमसे हैं
तुम हममें हो, हमारे अंतस में हो।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार।
तुम्हारे जीवन की अनंत
रश्मियों से ज्योतित हैं हम
तुम्हारे स्नेह से सिंचित हैं हम
तुम्हारा प्रेम बसा है हममें
तुम हम में हो, पर बेनाम।
तुम्हारे रूप से आसक्ति है
तुम्हारे चरित्र से भक्ति है
तुम्हारे स्पर्श ने रचा है हमें
तुम्हारे रस ने सिंचा है हमें
तुम्हारे गंध ने जोड़ा है हमें
सुरम्य सृष्टि से, इस जगती से
फिर भी तुम अनाम हो
फिर भी तुम अशब्द हो,
पर तुम हो,और हम तुमसे हैं
तुम हममें हो, हमारे अंतस में हो।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार।
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