कविता
कौन कहता है
कि इस दुनिया को
ईश्वर ने रच- रच कर बनाया है?
मुझे तो लगता है कि इसे जरूर किसी
मजदूर ने बनाया होगा।
उसने ही गढ़ा होगा
सूरज और चाँद को
किसी विशालकाय चाक पर,
उसने ही सजाए होंगे तारे,
ग्रह- उपग्रह,
उसने ही खोदे होंगे सागर
और बहायी होगी नदियाँ
उसने ही रचा होगा पहाड़
और लगाए होगें पेड़
जोते होंगे खेत
लगायी होगी फसलें
उसने ही बुना होगा वस्त्र
और ढकी होगी नग्नता।
ईश्वर ने तो बस इन पर खुदवा लिया है
अपना नाम,
जो अब उनका कापीराइट हो गया है!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
कौन कहता है
कि इस दुनिया को
ईश्वर ने रच- रच कर बनाया है?
मुझे तो लगता है कि इसे जरूर किसी
मजदूर ने बनाया होगा।
उसने ही गढ़ा होगा
सूरज और चाँद को
किसी विशालकाय चाक पर,
उसने ही सजाए होंगे तारे,
ग्रह- उपग्रह,
उसने ही खोदे होंगे सागर
और बहायी होगी नदियाँ
उसने ही रचा होगा पहाड़
और लगाए होगें पेड़
जोते होंगे खेत
लगायी होगी फसलें
उसने ही बुना होगा वस्त्र
और ढकी होगी नग्नता।
ईश्वर ने तो बस इन पर खुदवा लिया है
अपना नाम,
जो अब उनका कापीराइट हो गया है!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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