टूट रहा जब देश हमारा
पूछ रहा हूँ एक सवाल
बूढ़ी हो गई यह आजादी
इसके हुए इकहत्तर साल
अंधी हो गयी इनकी आँखें
पक गये इनके सारे बाल
कान से भी यह हो गयी बहरी
पिचक गये हैं इनके गाल
हाथ लकुटिया थाम चली है
नहीं बचेगी साल दो साल
देश अगर टूटा फिर से तो
पीछे होगा तू सौ साल
दुनिया नभ में सैर करेगी
होगा तेरा कौन हवाल
पूछ रहा हूँ एक सवाल
पूछ रहा हूँ एक सवाल!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
पूछ रहा हूँ एक सवाल
बूढ़ी हो गई यह आजादी
इसके हुए इकहत्तर साल
अंधी हो गयी इनकी आँखें
पक गये इनके सारे बाल
कान से भी यह हो गयी बहरी
पिचक गये हैं इनके गाल
हाथ लकुटिया थाम चली है
नहीं बचेगी साल दो साल
देश अगर टूटा फिर से तो
पीछे होगा तू सौ साल
दुनिया नभ में सैर करेगी
होगा तेरा कौन हवाल
पूछ रहा हूँ एक सवाल
पूछ रहा हूँ एक सवाल!
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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