देववाणी संस्कृत की सबसे ज्येष्ठ पुत्री हिन्दी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी संरक्षिका एवं सामाजिक,राजनीतिक और धार्मिक विचारों की संवाहिका है। वह देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ है। भारत के अतिरिक्त मारीशस, फिजी, वियतनाम, गियाना, त्रिनिदाद, दक्षिणी अमेरिका और आस्ट्रेलिया आदि देशों में तेजी से फैल रही हिन्दी भारत की स्वयंसिद्ध जनभाषा और राष्ट्रभाषा है। वह केवल विद्वानों और शहरियों की भाषा नहीं है भारत के सुदूर गाँवों में रहने वाले लाखों किसानों, मजदूरों, ठेले - रिक्शे चालकों, फेरीवालों के जीविकोपार्जन की भाषा है। इसीलिए आज उसे न तो किसी संवैधानिक अधिकार की जरूरत है और न ही किसी राजनीतिक संरक्षण की।
आज हिन्दी भले ही मैकालियत पद्धति से शिक्षा प्राप्त कर रहे मुट्ठी भर लोगों के बीच उपेक्षिता बन रही हो! तथापि भारत के सुविधाहीन सरकारी स्कूलों में हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने वाले करोड़ों नौनिहाल के हाथ में सुरक्षित है।वही इसके सच्चे ध्वजवाहक होंगे।
आज भूमंडलीकरण के दौर में बाजार की अवधारणा ने यह स्थापित कर दिया है कि भारत में अंग्रेजी का नहीं, हिन्दी का बाजार है। आज जितने विदेशी चैनल दूरदर्शन पर दिखलाए जा रहे हैं, वे पहले अंग्रेजी में थे, पर धीरे-धीरे पूरी तरह हिन्दी के हो गए।इसका कारण यह था कि अंग्रेजी के यहाँ श्रोता- दर्शक मात्र दो- तीन प्रतिशत ही हैं। इसीलिए उन्हें 'डिस्कवरी' एवं 'नेशनल ज्यॉग्रेफिक' के तमाम कार्यक्रमों को हिन्दी में डब करना पड़ा।
कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि क्या इससे हिन्दी 'बाजारू' नहीं हो गयी है? उसका रूप नहीं बिगड़ गया है? उसमें भदेसपन नहीं आ गया है? उस पर व्यावसायिकता का दबाव नहीं बढ़ गया है? ये सवाल अपनी जगह सही हैं, पर बाजार की एक शर्त है- 'जो बिकेगा, वही टिकेगा!' आप देखें कि आज मीडिया में, सिनेमा में, दूरसंचार में हिन्दी ने भारत के बाजार में अंग्रेजी को पटकनी दे दी है। भले ही राजभाषा के रूप में वह दूसरे स्थान पर रहे, पर जन- जीवन में उसी की धुन बजती रहेगी।
उमेश कुमार शर्मा
( युवा रचनाकार)
संप्रति- शोधार्थी,
विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
लनामिवि, दरभंगा
मो.-8877462692
आज हिन्दी भले ही मैकालियत पद्धति से शिक्षा प्राप्त कर रहे मुट्ठी भर लोगों के बीच उपेक्षिता बन रही हो! तथापि भारत के सुविधाहीन सरकारी स्कूलों में हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने वाले करोड़ों नौनिहाल के हाथ में सुरक्षित है।वही इसके सच्चे ध्वजवाहक होंगे।
आज भूमंडलीकरण के दौर में बाजार की अवधारणा ने यह स्थापित कर दिया है कि भारत में अंग्रेजी का नहीं, हिन्दी का बाजार है। आज जितने विदेशी चैनल दूरदर्शन पर दिखलाए जा रहे हैं, वे पहले अंग्रेजी में थे, पर धीरे-धीरे पूरी तरह हिन्दी के हो गए।इसका कारण यह था कि अंग्रेजी के यहाँ श्रोता- दर्शक मात्र दो- तीन प्रतिशत ही हैं। इसीलिए उन्हें 'डिस्कवरी' एवं 'नेशनल ज्यॉग्रेफिक' के तमाम कार्यक्रमों को हिन्दी में डब करना पड़ा।
कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि क्या इससे हिन्दी 'बाजारू' नहीं हो गयी है? उसका रूप नहीं बिगड़ गया है? उसमें भदेसपन नहीं आ गया है? उस पर व्यावसायिकता का दबाव नहीं बढ़ गया है? ये सवाल अपनी जगह सही हैं, पर बाजार की एक शर्त है- 'जो बिकेगा, वही टिकेगा!' आप देखें कि आज मीडिया में, सिनेमा में, दूरसंचार में हिन्दी ने भारत के बाजार में अंग्रेजी को पटकनी दे दी है। भले ही राजभाषा के रूप में वह दूसरे स्थान पर रहे, पर जन- जीवन में उसी की धुन बजती रहेगी।
उमेश कुमार शर्मा
( युवा रचनाकार)
संप्रति- शोधार्थी,
विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
लनामिवि, दरभंगा
मो.-8877462692
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