कहानी
मेढ़क का टर्र-टर्र और पंडुक की टिहुक-टिहुक के साथ कोशी नदी की कल-कल की ध्वनि अंधेरी रात की निःशब्दता को भंग कर रही थी। पूरा गाँव सो चुका था।रसियारी वाली, सोमनी, दीपुआ सभी खर्राटे ले रहे थे। दोनों बैल भी अपने राग में थुथून घुसेरकर फों-फों कर रहे थे।लेकिन गोनर था, जिसे नींद नहीं आ रही थी।उसके लिए तो मानों यह कालरात्रि थी- कापरेटिव बैंक ने कर्ज माफ नहीं किया।किसानों का आंदोलन नाकाम हो गया।उन्हें पूरी उम्मीद थी कि फसल दह जाने पर किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा।ऊपर से दहनाली का मुआवजा मिलेगा , लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.......कर्ज वापस नहीं करने वाले किसानों पर कुर्की- जब्दी का फरमान जारी कर दिया गया। गोनर किसानों की ओर से बैंक अधिकारी के सामने हाथ जोड़ता रहा।गिड़गिड़ाता रहा -"हुजूर रौदी नहीं होने के कारण मूँग नहीं फरा और भीषण बाढ़ ने धान को चौपट कर दिया।हुजूर अब तो खेत में बस मनीजर और पटुआ बचे हैं।किसान कहाँ से पैसा देगा?"
"तुम लोगों की नेतागिरी हम खूब समझते हैं।इस सबसे कुच्छो नहीं होगा।" बैंक आफिसर लाल हो गए- "सरकार ने कर्ज माफी से मना किया है और बैंक को वसूली का आदेश दिया है।तुमलोग बेकार का झंझट करते हो।"
हुजूर इन किसानों को देखिये।सब छोट-मोट जोतदार हैं।किसी के पास पाँच बीघा से अधिक जमीन नहीं है।और खेती- पथारी को छोड़कर इनके पास आमदनी.का दूसरा कोई साधन भी नहीं है।अगर कर्ज माफ नहीं किया गया तो ये मर जाएंगे...आत्महत्या कर लेंगे।" गोनर ने अपने तरकस का आखिरी वाण छोड़ दिया।
लेकिन आफिसर उसे ढ़ाल पर लेते हुए कहा-"मरने दो, रोज- रोज किसान मरते हैं .....सुसाइड करते हैं।यह सब सरकार का मामला है।"
गोनर निहत्था हो गया।किसान हताश हो गए।उन्हें गोनर के प्रतिनिधित्व पर बहुत भरोसा था, जो टूट गया।गाँव के नेताओं पर से उनका भरोसा तभी उठ गया था, जब उसने निरीह किसानों से पचास हजार पर अंगूठ लगवा कर चालीस हजार दिये थे।
घर की ओलती में तार से झूलता हुआ दीया हवाओं की मार खाकर न जाने कब का बुझ चुका था।चारों तरफ घुप्प अंधकार, जो धीरे-धीरे गोनर के भीतर समाता जा रहा था।वह उठकर बैठ गया और मुँह में अधजली बीड़ी दवाकर माचिस पर तीलियाँ घिसने लगा।अब तक तीन तीलियाँ दगा दे गयीं।चौथी बीड़ी को जलाने में असमर्थ सिद्ध हुई।फिर उसने बीड़ी को मसलकर नीचे फेंक दिया और पाँचवीं तीली घिसकर दीया जला दिया।
रात के करीब दो बज रहे थे।गोनर ने संदूक के कोने पर से कापी उठाई और उसमें लिखने लगा। हमको माफ कर देना सोमनी की माई........लगता है कि हम हार गए । लेकिन तूँ देखना मेरे मरने के बाद किसानों का करज माफ हो जाएगा । दहनाली का मुआवजा मिलेगा ।गाँव में खुशहाली आएगी ।तूँ हिम्मत नहीं हारना।दूनू बैल बेच के झोटन बाबू का करजा सधा देना।और एक बीघा खेत बेच के सोमनी का बियाह कर देना।दीपुआ को अगहन में कपिल भाई के साथ पंजाब भेज देना।अब यहाँ की खेती में जान अरपने से कोनो फैदा नहीं है।चारों तरफ लूट मची है।सब किसाने को लूटता है।नकली खाद ,नकली बीज केतना से लड़ें ? लेकिन तूँ चिंता नहीं करना ,सब ठीक हो जाएगा।हिम्मत से रहना ।ई हमर आखिरी वचन है।तोहर गोनर।
फिर वह उठकर दीया दिया।घुप्प अधेरा। इस अंधेरे के बीच से कोशी की कल- कल ध्वनि उसे बुला रही थी।माता उसे जिंदगी के तमाम झंझटों से मुक्त कर देना चाहती थी।
गोनर उठकर खड़ा हो गया,लेकिन रसियारी वाली ने करवट ली तो वह काँप गया।लेकिन अच्छा हुआ कि उनकी आँखें बंद थीं।इधर दोनों बैल जाग गये थे- कैला और सिलेबिया।
सिलेबिया अभी इधर ही देख रहा था।वह कितना सा था ,जब उसकी मां मरी थी।कैला तीन दिनों घास-पानी नहीं खाया। दोनों इस परिवार के दुख-सुख का साथी है।सात साल पहले जब सिलेबिया के कंधे पर पालो पड़ा था तो कैसन कछमछा रहा था।कैला होशियार था ।वह अपने छोटे भाई पर जादे भार नहीं पड़ने देता।इधर जब कैला का देह टूट गया ,तब सिलेबिया ने दाहिना पालो बहकर उसका करज उतार दिया।
गोनर का मन भाव धारा में उपलाने लगा।उसने हाथ जोड़कर कहा -"तूँ दूनू हमर भाई है।हमरा माफ कर देना।तूँ लोग हमरा कायर कहेगा ।कह लेना ....नहीं मना करते हैं।"
वह नदी की ओर बढ़ता जा रहा था।अपने से दूर.....अपनों से दूर।कोई उसे जोर-जोर से बुला रहा था...... जल्दी.....बहुत जल्दी। वह कास पटेर और मनीजर की झाड़ियों को चीरता हुआ तेजी से भागता जा रहा था।मानों कोई उसे तेजी से खींच रहा था।बजबजाते हुए खेत में उनके पाँव धँस रहे थे, फिर भी वह नहीं रुका....चलता रहा..... चलता रहा......
"सोमनी के बाबू कहाँ भागे जा रहे हो ?"
गोनर का देह सनसना गया।रसियारी वाली की आवाज है।कैसे जाग गयी ?
"हमरो ले ले चलो।हमसे ई दुख नहीं सहा जाएगा।"
पीछे से सोमनी और दीपुआ का समवेत स्वर-"बाबू जी हमरा सब के ककरा भरोसे छोड़ के जा रहे हो।हम लोग भी तोरे संग जाएंगे।"
गोनर पीछे मुड़ा-"कोय नहीं जाएगा .....कोय नहीं जाएगा हमरा साथ।किसान का करज माफ हो जाएगा।गाँव में खुशहाली आएगी.....कोय नहीं जाएगा !"
वह फिर पीछे मुड़ा ।अरे पीछे तो कोय नहीं है।मन का भरम है।माया का जाल है, जो जीवन को घेरे रहता है।
गोनर नदी के किनारे पहुँच चुका था।माता बाँहें फैला रखी थीं।विशाल जल- समूह उसे अपने में समेट लेने को ऊफना रहा था।उसने अंतिम बार अपने गाँव को कातर भाव से देखा और फिर पूरी शक्ति लगाकर नदी में छलांग लगा दिया।
लेकिन यह क्या, वह नदी के बदले जमीन पर आकर धम्म से गिरा। उसे कैला और सिलेबिया ने एक साथ धक्का दिया था।अब दोनों उसे घेरकर खड़े थे।मानो कह रहा हो -"हम रह के क्या करेंगे.....तूने हमें बेच देने को कहा न.......खूब परेम करता है हमसे.......भाई कहता है..... भाई को कोई बेचता है रे बेईमान....जहर ला के खिला दो....हम सब तोरा कोनो काम के नहीं रह गए हैं।"
गोनर स्वप्न से जाग उठा ।उसका मन उसे धिक्कारने लगा-तूँ ही डूब जाएगा तो इन सबका क्या होगा ? गाँव के किसानों का क्या होगा ?
वह संभलकर उठा और घर की ओर चल पड़ा।खेत में अब भी पाँव धँस रहे थे।मानो वह रोपनी के लिए तैयार हो। गोनर की आँखें चमक उठीं।अंतस का दीपक जल उठा- धान दह गया तो क्या हुआ,इसमें रोपनी हो ही सकती है।अभी तो भादो चढ़ा ही है।उसने रूक कर आकाश की ओर देखा।भुरूकवा की रोशनी को सूरज की लालिमा ने लील लिया था।अब भीतर से बाहर तक उजाला ही उजाला था।
उसने देखा कि खेत का पानी आड़ को लांघकर नदी वापस जा रहा है।फिर देरी किस बात की? गोनर ने कसकर पगड़ी बांधी और गीली मिट्टी आड़ पर थोपने लगा।
इधर दीपुआ ने कैला और सिलेबिया के कंधे पर पालो डालकर हल लाद दिया था।उधर रसियारी वाली और सोमनी दूसरी आड़ पर मिट्टी थोप रही थीं।
गोनर ने अपना कमर सीधा किया ,तो देखा कि सबकी आँखों में चमक है।अब उसे लगा कि उसने जिंदगी का जंग जीत लिया है।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
लेकिन यह क्या, वह नदी के बदले जमीन पर आकर धम्म से गिरा। उसे कैला और सिलेबिया ने एक साथ धक्का दिया था।अब दोनों उसे घेरकर खड़े थे।मानो कह रहा हो -"हम रह के क्या करेंगे.....तूने हमें बेच देने को कहा न.......खूब परेम करता है हमसे.......भाई कहता है..... भाई को कोई बेचता है रे बेईमान....जहर ला के खिला दो....हम सब तोरा कोनो काम के नहीं रह गए हैं।"
गोनर स्वप्न से जाग उठा ।उसका मन उसे धिक्कारने लगा-तूँ ही डूब जाएगा तो इन सबका क्या होगा ? गाँव के किसानों का क्या होगा ?
वह संभलकर उठा और घर की ओर चल पड़ा।खेत में अब भी पाँव धँस रहे थे।मानो वह रोपनी के लिए तैयार हो। गोनर की आँखें चमक उठीं।अंतस का दीपक जल उठा- धान दह गया तो क्या हुआ,इसमें रोपनी हो ही सकती है।अभी तो भादो चढ़ा ही है।उसने रूक कर आकाश की ओर देखा।भुरूकवा की रोशनी को सूरज की लालिमा ने लील लिया था।अब भीतर से बाहर तक उजाला ही उजाला था।
उसने देखा कि खेत का पानी आड़ को लांघकर नदी वापस जा रहा है।फिर देरी किस बात की? गोनर ने कसकर पगड़ी बांधी और गीली मिट्टी आड़ पर थोपने लगा।
इधर दीपुआ ने कैला और सिलेबिया के कंधे पर पालो डालकर हल लाद दिया था।उधर रसियारी वाली और सोमनी दूसरी आड़ पर मिट्टी थोप रही थीं।
गोनर ने अपना कमर सीधा किया ,तो देखा कि सबकी आँखों में चमक है।अब उसे लगा कि उसने जिंदगी का जंग जीत लिया है।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
Mai bahut khush hun ki aap jaise lekhak ka ashirwad mujh par hai
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