रिश्तो का सच
जानती है लड़की,
क्योंकि
जब भी कभी कोई
प्यार से कहता है उसे बेटी
या बेटा कहकर पुचकारता है
तो वह देखती रहती है
उनके हाथों का बढा़व
महसूसती है जगह-वेजगह
उनकी छुअन
और फिर नापने लगती है वह
रिश्तो की गहराई।
जब भी कभी कोई उसे
कहकर पुकारता है बहन
तो वह नापती है उनकी आँखों में
वासना की लहर
अनुभव के थर्मामीटर से।
जब भी कभी कोई उसे
कहता है दोस्त
तो वह खोजने लगती है
शब्दों का अर्थ,
ताड़ने लगती है
उसके अंतस का मन्तव्य
और फिर चित्कार कर कहता है
उसका अन्तर्मन कि
रिश्तो में पड़ गयी है इतनी दरारें
कि वह सी नहीं सकती
हर आदमी में घुला है इतना जहर
कि वह पी नहीं सकती।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
अति शुन्दर
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