सूख गयी है अंतस की सरिता
एक धार इधर भी बहाना होगा ।
ऊजर गया है जीवन का उपवन
कुछ पेड़ इधर भी लगाना होगा ।
खुद को कहीं भुला न दे आदमी
उसे फिर लगता कि जगाना होगा ।
कहीं बिक न जाए चंद सिक्कों में
आईना फिर उसे दिखाना होगा ।
हमें जीना नहीं बस रोटी के खातिर
मोल अपना जग को बताना होगा ।
यूँ तो मँजे डगर पे चलती है दुनिया
हमें राह खुद का खुद ही बनाना होगा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
एक धार इधर भी बहाना होगा ।
ऊजर गया है जीवन का उपवन
कुछ पेड़ इधर भी लगाना होगा ।
खुद को कहीं भुला न दे आदमी
उसे फिर लगता कि जगाना होगा ।
कहीं बिक न जाए चंद सिक्कों में
आईना फिर उसे दिखाना होगा ।
हमें जीना नहीं बस रोटी के खातिर
मोल अपना जग को बताना होगा ।
यूँ तो मँजे डगर पे चलती है दुनिया
हमें राह खुद का खुद ही बनाना होगा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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