लघुकथा :
पी.एम.सी.एच. के इमर्जेंंसी वार्ड में बेेड नंबर -73 पर भर्ती राकेश की आँँखें जब सात घंटे बाद खुुलीं तो उसकी नजर प्लास्टर हुए बाएँ पैर और माथे तथा शरीर के कई जगहों पर बंधी पट्टी पर नहीं, तकिये के नीचे रखे स्मार्ट फोन पर गयी।
सोशल साइट्स पर अत्यंत लोकप्रिय राकेश के चाहनेे वालों की कोई कमी न थी। फेेेेसबुक पर उनके 5,000 मित्र और 23,000 फोलोअर्स थे। वाट्सअप से 742 लोग जुड़े थे तो मैसेेन्जर पर 2000 के करीब। राकेश ने तुरंत फेसबुक पर जाकर अपने उस तस्वीर पर मिले लाइक्स, शेयर और कमेन्ट्स को आँँखें फार कर देखा, जिसे उसने ट्रेन दुर्घटना में घायल होने के बाद होश रहते हुए डाल दिया था। अब तक उन्हें 1377 लाइक्स, 300 सेे अधिक कमेन्ट्स मिले थे तथा 24 लोगों ने तस्वीर को शेयर किया था। कमाल हो गया! अब तक के उनके सारे रिकॉर्ड टूूूट गये। इतने लाइक और शेयर.........राकेेेश की सारी पीड़ा मिट गयी। फिर उसने एक- एक कर सारे कमेंट्स पढ़ने शुरू किये......
'कैसे हो गया यह सब, आप जल्दी से स्वस्थ हो जाइए!'
'ईश्वर आपकी रक्षा करे.......!'
'हम सब इस बुरे वक्त में आपके साथ हैं!'
'ठीक से ईलाज कराइये और आराम कीजिए।'
'ओ सेट्ट.... बहुत बुरा हुआ!'
'ओ माई गॉड!' आदि- आदि......।
राकेश का मन भर आया। उनके चाहने वाले इस घटना से कितने आहत हैं। परन्तु पूजा? पूजा कहाँ गुम हो गयी...???
पूजा की याद आते ही राकेश का मन व्याकुुुल हो गया। पूजा उसकी फेसबुकिया गर्लफ्रेंड थी, जिससे आज तक मिलने का अवसर न मिला था।
वह फ्रेंडलिस्ट में जाकर पूूजा को सर्च मारा। ढेर सारी तस्वीरें इंगेेजमेंट के.......अनेक मुुद्रा में अपने होने वाले पति के साथ तस्वीरें.....राकेश का दिल चकनाचूर हो गया! फेेेसबुक से वाट्सअप पर इतना चेटिंग होता रहा, पर वह कभी कुछ बतायी क्यों नहीं! उसने क्या- क्या सपने देखे थे! सब रेत के बने महल की भाँति अचानक भरभरा गया.....दिल के टुकड़े हजार हुए, कुुुछ इधर गिरा, कुछ उधर गिरा!
लेकिन राकेश भी इतना उल्लू नहीं था, वह आज के जमाने का लड़का है।लड़कियाँ कैसे छिपकली की भाँति रंग बदलती हैं, उसे भलीभाँति पता था ? इसलिए वह प्रेेेम भी करता है तो विकल्प रखकर।
उसने तुुुरंत नेहा को सर्च मारा। वहाँ भी तस्वीरों की बहार.....लाल रंग की साडी़ में नेेहा नाक की टूसी से लेकर मांग केे भीतर तक सिंदूर लेपी हुई , सती सावित्री लग रही थी। राकेश सन्न रह गया- 'नेेहा शादी-शुदा है? हे भगवान्'! राकेश ने गहरी सांस ली।
उसने वाट्सअप खोला। वहाँ भी सहानुुभूति देने वालों की कोई कमी नहीं थी। किसी ने दवा भेेजा था, किसी ने डाक्टर , तो किसी ने एम्बुलेन्स! राकेश की आँँखें भर आयीं। मोबाइल हाथ से गिर पड़ा। उसे इस हाल में भी कोई मित्र देखने नहीं आया। उसका मन खींज गया- हाय रे! सोशल साइट्स!! तूँ कितना अनसोशल है!!! आज भी अगर कोई पास बैठी है तो वह माँ है। कोई बेेचैन है, तो वे बाबूजी हैंं। कोई दवा लाने गया हैै तो वह छोटा भाई है। कोई मुुुँह में रोटी खिला रही है तो वह छोटी बहन है।
राकेश का अंतःमन चित्कार उठा- वह आज तक जिनसे दूूूर- दूर रहा.... कटा रहा, वह कितना अपना है! और जिनके पास रहा....जिन्हें अपना समझता रहा, वह कितना दूर-दूर है।
उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
पी.एम.सी.एच. के इमर्जेंंसी वार्ड में बेेड नंबर -73 पर भर्ती राकेश की आँँखें जब सात घंटे बाद खुुलीं तो उसकी नजर प्लास्टर हुए बाएँ पैर और माथे तथा शरीर के कई जगहों पर बंधी पट्टी पर नहीं, तकिये के नीचे रखे स्मार्ट फोन पर गयी।
सोशल साइट्स पर अत्यंत लोकप्रिय राकेश के चाहनेे वालों की कोई कमी न थी। फेेेेसबुक पर उनके 5,000 मित्र और 23,000 फोलोअर्स थे। वाट्सअप से 742 लोग जुड़े थे तो मैसेेन्जर पर 2000 के करीब। राकेश ने तुरंत फेसबुक पर जाकर अपने उस तस्वीर पर मिले लाइक्स, शेयर और कमेन्ट्स को आँँखें फार कर देखा, जिसे उसने ट्रेन दुर्घटना में घायल होने के बाद होश रहते हुए डाल दिया था। अब तक उन्हें 1377 लाइक्स, 300 सेे अधिक कमेन्ट्स मिले थे तथा 24 लोगों ने तस्वीर को शेयर किया था। कमाल हो गया! अब तक के उनके सारे रिकॉर्ड टूूूट गये। इतने लाइक और शेयर.........राकेेेश की सारी पीड़ा मिट गयी। फिर उसने एक- एक कर सारे कमेंट्स पढ़ने शुरू किये......
'कैसे हो गया यह सब, आप जल्दी से स्वस्थ हो जाइए!'
'ईश्वर आपकी रक्षा करे.......!'
'हम सब इस बुरे वक्त में आपके साथ हैं!'
'ठीक से ईलाज कराइये और आराम कीजिए।'
'ओ सेट्ट.... बहुत बुरा हुआ!'
'ओ माई गॉड!' आदि- आदि......।
राकेश का मन भर आया। उनके चाहने वाले इस घटना से कितने आहत हैं। परन्तु पूजा? पूजा कहाँ गुम हो गयी...???
पूजा की याद आते ही राकेश का मन व्याकुुुल हो गया। पूजा उसकी फेसबुकिया गर्लफ्रेंड थी, जिससे आज तक मिलने का अवसर न मिला था।
वह फ्रेंडलिस्ट में जाकर पूूजा को सर्च मारा। ढेर सारी तस्वीरें इंगेेजमेंट के.......अनेक मुुद्रा में अपने होने वाले पति के साथ तस्वीरें.....राकेश का दिल चकनाचूर हो गया! फेेेसबुक से वाट्सअप पर इतना चेटिंग होता रहा, पर वह कभी कुछ बतायी क्यों नहीं! उसने क्या- क्या सपने देखे थे! सब रेत के बने महल की भाँति अचानक भरभरा गया.....दिल के टुकड़े हजार हुए, कुुुछ इधर गिरा, कुछ उधर गिरा!
लेकिन राकेश भी इतना उल्लू नहीं था, वह आज के जमाने का लड़का है।लड़कियाँ कैसे छिपकली की भाँति रंग बदलती हैं, उसे भलीभाँति पता था ? इसलिए वह प्रेेेम भी करता है तो विकल्प रखकर।
उसने तुुुरंत नेहा को सर्च मारा। वहाँ भी तस्वीरों की बहार.....लाल रंग की साडी़ में नेेहा नाक की टूसी से लेकर मांग केे भीतर तक सिंदूर लेपी हुई , सती सावित्री लग रही थी। राकेश सन्न रह गया- 'नेेहा शादी-शुदा है? हे भगवान्'! राकेश ने गहरी सांस ली।
उसने वाट्सअप खोला। वहाँ भी सहानुुभूति देने वालों की कोई कमी नहीं थी। किसी ने दवा भेेजा था, किसी ने डाक्टर , तो किसी ने एम्बुलेन्स! राकेश की आँँखें भर आयीं। मोबाइल हाथ से गिर पड़ा। उसे इस हाल में भी कोई मित्र देखने नहीं आया। उसका मन खींज गया- हाय रे! सोशल साइट्स!! तूँ कितना अनसोशल है!!! आज भी अगर कोई पास बैठी है तो वह माँ है। कोई बेेचैन है, तो वे बाबूजी हैंं। कोई दवा लाने गया हैै तो वह छोटा भाई है। कोई मुुुँह में रोटी खिला रही है तो वह छोटी बहन है।
राकेश का अंतःमन चित्कार उठा- वह आज तक जिनसे दूूूर- दूर रहा.... कटा रहा, वह कितना अपना है! और जिनके पास रहा....जिन्हें अपना समझता रहा, वह कितना दूर-दूर है।
उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
Bahut manoranjak
ReplyDelete