माँ!
अगर तुम हार जाओ
मुझे बचाने के संघर्ष में
अगर पापा को न दे कोई
उधार के चंद रूपये दवा के लिए
या फिर उन्हें न मिले
दिन भर की मजदूरी शाम में,
टाल जाए कोई मालिक कल के नाम पर
और मैं हार जाऊँ जिंदगी का जंग
मौत समेट ले मुझे अपनी गोद में
तो माँ, तूँ मत बंद करना मेरी आँखें
मैं जाते-जाते देख लेना चाहता हूँ उनके चेहरे,
जो मेरी मौत पर राजनीति करने आते हैं।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
(मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत से आहत)
अगर तुम हार जाओ
मुझे बचाने के संघर्ष में
अगर पापा को न दे कोई
उधार के चंद रूपये दवा के लिए
या फिर उन्हें न मिले
दिन भर की मजदूरी शाम में,
टाल जाए कोई मालिक कल के नाम पर
और मैं हार जाऊँ जिंदगी का जंग
मौत समेट ले मुझे अपनी गोद में
तो माँ, तूँ मत बंद करना मेरी आँखें
मैं जाते-जाते देख लेना चाहता हूँ उनके चेहरे,
जो मेरी मौत पर राजनीति करने आते हैं।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
(मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत से आहत)
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