लघुकथा :
साल भर के वृद्धा-पेंशन की राशि आते ही ब्लाॅक परिसर में वृद्धों की भीड़ लग गयी। उनके मुरझाए चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। दस बजने से पहले ही मैले- कुचले चिथड़े लपेटे वृद्ध-वृद्धाएँ कतारबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगे। एक- एक कर सारे वृद्ध नगदी लेकर चलते गये,लेकिन जमुना देवी? जमुना देवी की बारी अबतक नहीं आयी?
वह कतार से निकलकर मुंशी जी के पास जाकर बोली- "साहेब, मेरे वाड का पाय बँट गया। सारे जने घर गये, हमको तेरा आदमी नहीं पुकारा?"
"क्या नाम है माताजी?" मुंशी जी ने पूछा।
"जमुना देवी। "
"पति ?"
"स्वर्गीय सोनेलाल सदा।"
"माता जी सूची के हिसाब से तो आप मर चुकी हैं।" मुंशी जी ने रजिस्टर पर नज़र दौड़ाते हुए जबाब दिया।
"क्या, मैं मर गयी? सूझता नहीं कि मैं अभी जिंदा हूँ।मरे तेरा पुरखा, हम क्यों मरें?"
"इससे क्या,आप जीवित होने का प्रमाण-पत्र बनवा कर यहाँ जमा कीजिए, तभी पेंशन मिलेगी।
यमुना, मुंशी जी को सरापती हुई घर आ गयी। फिर बेरोजगार बेटे ने ग्राम पंचायत से लेकर ब्लाॅक तक का चक्कर लगाकर माँ के जीवित होने का प्रमाण-पत्र बनवा लिया।
मुंशी जी ने पेंशन की राशि यमुना देवी के हाथ में थमा दिये।
आज माँ- बेटे दोनों प्रसन्न थे, क्योंकि उन्हीं पैसे से माँ को नया कफन मिल गया और बेटे ने उनके श्राद्ध का भी पूरा इंतजाम कर लिया।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
साल भर के वृद्धा-पेंशन की राशि आते ही ब्लाॅक परिसर में वृद्धों की भीड़ लग गयी। उनके मुरझाए चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। दस बजने से पहले ही मैले- कुचले चिथड़े लपेटे वृद्ध-वृद्धाएँ कतारबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगे। एक- एक कर सारे वृद्ध नगदी लेकर चलते गये,लेकिन जमुना देवी? जमुना देवी की बारी अबतक नहीं आयी?
वह कतार से निकलकर मुंशी जी के पास जाकर बोली- "साहेब, मेरे वाड का पाय बँट गया। सारे जने घर गये, हमको तेरा आदमी नहीं पुकारा?"
"क्या नाम है माताजी?" मुंशी जी ने पूछा।
"जमुना देवी। "
"पति ?"
"स्वर्गीय सोनेलाल सदा।"
"माता जी सूची के हिसाब से तो आप मर चुकी हैं।" मुंशी जी ने रजिस्टर पर नज़र दौड़ाते हुए जबाब दिया।
"क्या, मैं मर गयी? सूझता नहीं कि मैं अभी जिंदा हूँ।मरे तेरा पुरखा, हम क्यों मरें?"
"इससे क्या,आप जीवित होने का प्रमाण-पत्र बनवा कर यहाँ जमा कीजिए, तभी पेंशन मिलेगी।
यमुना, मुंशी जी को सरापती हुई घर आ गयी। फिर बेरोजगार बेटे ने ग्राम पंचायत से लेकर ब्लाॅक तक का चक्कर लगाकर माँ के जीवित होने का प्रमाण-पत्र बनवा लिया।
मुंशी जी ने पेंशन की राशि यमुना देवी के हाथ में थमा दिये।
आज माँ- बेटे दोनों प्रसन्न थे, क्योंकि उन्हीं पैसे से माँ को नया कफन मिल गया और बेटे ने उनके श्राद्ध का भी पूरा इंतजाम कर लिया।
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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