बहुत पुरानी कहावत है कि जब रोम जल रहा था, नीरो वंशी बजा रहा था! यह कहावत उस समय रोम के लिए कितना प्रासंगिक था, नहीं पता, पर यह मौजूदा दौर में भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।जब देश गरीबी, फटेहाली, अशिक्षा, बेरोजगारी, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद और धर्मवाद की चक्की में पिस रहा हो। पीने का साफ पानी, और सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु के लिए तरस रहा हो। आम भारतीयों को इलाज के लिए सरकारी अस्पताल के डाक्टरों का गोड़ छानना पड़ रहा हो, तब भी अगर चुनाव के मुद्दे राम मंदिर का निर्माण और गौ माता की रक्षा हो, हिन्दुत्व बनाम मनुवाद का उत्थान हो तो देश का क्या होगा, यह अकल्पनीय है।
मलमल और खाकी के नाभिनाल संबंध तथा मीडिया का मूकदर्शक हो जाना और बुद्धिजीवियों का नपुंसक हो जाना अत्यंत भयानक अवस्था के आगमन के संकेत हैं।
अभी हाल की मुजफ्फरपुर की त्रासद घटना, जिसमें सैकड़ों दुधमुँहे मृत्यु के शिकार हो गये। उसकी ओर न तो सत्तासीनों का ध्यान है न ही देश के चौथे स्तम्भ का! इस बदहाल अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर काम किया जा रहा है। यह तो वैसी ही बात हो गयी कि घर आग लगी हो, उस समय आग बुझाने के बजाय आग लगने के कारणों की समीक्षा हो रही हो।
'जून के महीना है, बच्चे मरेंगे ही। अभिभावक को बच्चों का ध्यान रखना चाहिए।' नेताजी कुछ इसी तरह की बात कहकर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। क्योंकि जो बच्चे मर रहे हैं, वे गरीबों के, कंगालों के बच्चे हैं। उनका जीना ही उनके मरने से अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ, अगर कहीं गौ- हत्या का मामला हो तो नेताजी का राष्ट्र-प्रेम देखते ही बनता है।
भारत में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ प्रजातंत्र में भी प्रच्छन्न राजतंत्र है। राजनीति में वे नहीं जा रहे जिन्हें जाना चाहिए। यहाँ राजनीति उनकी बपौती है,जिनके पुरखे राजनीति में हैं।तभी तो एक ओर जहाँ लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हों, वहीं दूसरी ओर 'स्टेच्यू आॅफ यूनिटी' के बहाने देश दुनिया के सामने अपनी छवि निखारने की कोशिश कर रहा हो इससे बढ़कर राष्ट्रप्रेम क्या हो सकता है?
पूँजीपतियों की गोद में कुंडली मार कर बैठे मौजूदा सत्तासीनों को देश की जनता से क्या वास्ता है? उसके पास वोट के लिए चोट भी है और नोट भी। और सबसे बढ़कर है- हिन्दुत्व का मुद्दा। जिससे संबद्ध है गौ-रक्षा और राम मंदिर। सरकार लाखों बेघर जनता की बजाय राम के बेघर होने की चिन्ता में दुबले होते जा रहे हैं। देश के किसानों की आत्महत्या की चिंता नहीं है उन्हें। जल-संकट से जूझते आम लोगों की चिन्ता नहीं है उसे, उसे चिंता है अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि की। तभी तो भूख से बिलबिलाती जनता के रहनुमाओं ने सपथ ग्रहण समारोह में देश और दुनिया के पेटभरों के लिए सैकड़ों लजीज व्यंजन का प्रबंध कर रहे थे। आखिरकार इस सरकार से अधिक अपेक्षा करना भ्रमपूर्ण होगा।
आज हमें स्वयं अपना ध्यान रखना होगा। स्वयं अपना रखवाला बनना होगा।
जय हिंद, जय भारत।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
मलमल और खाकी के नाभिनाल संबंध तथा मीडिया का मूकदर्शक हो जाना और बुद्धिजीवियों का नपुंसक हो जाना अत्यंत भयानक अवस्था के आगमन के संकेत हैं।
अभी हाल की मुजफ्फरपुर की त्रासद घटना, जिसमें सैकड़ों दुधमुँहे मृत्यु के शिकार हो गये। उसकी ओर न तो सत्तासीनों का ध्यान है न ही देश के चौथे स्तम्भ का! इस बदहाल अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर काम किया जा रहा है। यह तो वैसी ही बात हो गयी कि घर आग लगी हो, उस समय आग बुझाने के बजाय आग लगने के कारणों की समीक्षा हो रही हो।
'जून के महीना है, बच्चे मरेंगे ही। अभिभावक को बच्चों का ध्यान रखना चाहिए।' नेताजी कुछ इसी तरह की बात कहकर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। क्योंकि जो बच्चे मर रहे हैं, वे गरीबों के, कंगालों के बच्चे हैं। उनका जीना ही उनके मरने से अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ, अगर कहीं गौ- हत्या का मामला हो तो नेताजी का राष्ट्र-प्रेम देखते ही बनता है।
भारत में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ प्रजातंत्र में भी प्रच्छन्न राजतंत्र है। राजनीति में वे नहीं जा रहे जिन्हें जाना चाहिए। यहाँ राजनीति उनकी बपौती है,जिनके पुरखे राजनीति में हैं।तभी तो एक ओर जहाँ लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हों, वहीं दूसरी ओर 'स्टेच्यू आॅफ यूनिटी' के बहाने देश दुनिया के सामने अपनी छवि निखारने की कोशिश कर रहा हो इससे बढ़कर राष्ट्रप्रेम क्या हो सकता है?
पूँजीपतियों की गोद में कुंडली मार कर बैठे मौजूदा सत्तासीनों को देश की जनता से क्या वास्ता है? उसके पास वोट के लिए चोट भी है और नोट भी। और सबसे बढ़कर है- हिन्दुत्व का मुद्दा। जिससे संबद्ध है गौ-रक्षा और राम मंदिर। सरकार लाखों बेघर जनता की बजाय राम के बेघर होने की चिन्ता में दुबले होते जा रहे हैं। देश के किसानों की आत्महत्या की चिंता नहीं है उन्हें। जल-संकट से जूझते आम लोगों की चिन्ता नहीं है उसे, उसे चिंता है अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि की। तभी तो भूख से बिलबिलाती जनता के रहनुमाओं ने सपथ ग्रहण समारोह में देश और दुनिया के पेटभरों के लिए सैकड़ों लजीज व्यंजन का प्रबंध कर रहे थे। आखिरकार इस सरकार से अधिक अपेक्षा करना भ्रमपूर्ण होगा।
आज हमें स्वयं अपना ध्यान रखना होगा। स्वयं अपना रखवाला बनना होगा।
जय हिंद, जय भारत।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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