ज्वलंत समस्या
जल से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जल से ही कई बार सृष्टि का विनाश भी हुआ है। 'मनु-स्मृति' में इसका जीवंत प्रमाण मिलता है। जल के साथ सृष्टि का अत्यंत गहरा संबंध है। जल के अभाव में प्राणी प्यास से मर जाता है, तो वहीं दूसरी ओर जल की अधिकता प्राणियों का सर्वनाश भी कर सकता है। मौजूदा समय में समस्या यह है कि प्राणियों को डुबाने केे लिए तो पर्याप्त जल है,पर पीने के लिए जल का अभाव है। जानकारों के मुताबिक वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) में वृृद्धि के कारण ग्लेेेेशियर बहुत तेेेेजी से पिघल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जल-स्तर में तजी से वृद्धि हो रही है। आगामी 25-30 वर्षों में भारत की मायानगरी मुंबई, चेेेन्नई समेत कई शहर जलमग्न हो जाएंगे!
यह सर्वविदित है कि सृष्टि मेंं जल का अकूूूत भंडार है, परन्तु माात्र 3% जल ही पीने के लायक है। शेष जल या तो खारे हैं या प्रदूषित। 3% जल जो कि नदियों, तालाबों, कुँँओं तथा भूमिगत जल के रूप में उपलब्ध है, उसका 60% से अधिक भाग कृषि-सिंचाई तथा कल कारखानों में उपयोग कर लिया जाता है। मतलब 3% जल का 40% भाग हम पीने तथा अन्य घरेलू कार्यों में उपयोग करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह कि यह 3% जल ही हमारा जीवन है। अब सबाल यह है कि हम अपने जीवन को कैैसे बचाएँ। शहरीकरण और बाजारवाद के विकास के साथ ही क्या यह संभव है। और खासकर तब, जब समाज कर्तव्यहीन हो चुुका हो। सबको अपनी पड़ी हो।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई, आवास तथा सड़कों, नालों के पक्कीकरण के कारण भूमिगत जल का रीसाइक्लिंग नहींं हो पा रहा है।हम पानी निकाल तो रहेे हैं, पर डाल नहीं रहेे हैं । वर्षा -जल के संरक्षण का भी कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। नदियों, तालाबों की साफ- सफाई की जगह उन्हें नष्ट किये जा रहे हैं। कुँए की स्थिति डायनासोर जैैसी हो गयी है। बीस-पच्चीस वर्षों बाद तो हमारे बच्चे कुँए के बारे में किताबोंं में ही पढेंगे, क्योंकि कुुुँए बहुत तेजी से कूड़ेदान में परिवर्तित हो रहे हैं।
जानकारों ने यह भी बताया है कि अगर
इसी प्रकार सबकुछ चलता रहा तो 2040 ई. तक भूमिगत जल लगभग समाप्त हो जाएगा।
कोशी के गर्भ से पैदा होनेे के कारण मैंने नजर के सामनेे से लोगों को डूब कर मरते हुए देखा है और शहर में रहकर लोगों को पानी के लिए लड़ते भी देखा है।संभावना व्यक्त की जा रही है कि तीसरा विश्वयुद्ध तेल के लिए नहीं, पानी के लिए होगा। मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र मेंं इसकी बानगी देखी जा सकती है,जहाँ लोग पानी के लिए मैराथन दौड़ में सुबह से ही शरीक जातेे हैं। वहीं दूसरी ओर पानी के अभाव में किसानों की खेती चौपट हो रही है और वे आत्महत्या कर रहे हैैं।
हमारे देश की करीब 70%आबादी को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है, लेकिन 10% आबादी एक लीटर साफ पानी पाने के फेर मेंं तीन लीटर पानी यूूँ ही बहा रही हैै। साथ ही हमारी ही जमीन से पानी निकाल कर हमारे ही हाथ में बीस रूपये लीटर पानी थमाने की साजिश चल रही है। शहरी क्षेत्रों में यह सब चालू है।शहरी अमीर अपनी जमीन में बोरिंग धसाकर अपने लिए तो पर्याप्त खींंच लेते हैंं, पर आसपास के गरीबों के चापाकल से केवल हवा निकलता हैै। और यदि एकाध लीटर पानी निकल भी आए तो उसमें आर्सेनिक की मात्रा पाया जाता है, जिसे पीकर बीमार होना लगभग तय है।
पानी, प्रकृति प्रदत्त सबसे खूबसूरत तोहफा है। ऐसा जीवनदायी अमृत, जिसका अपना कोई रंग नहीं। जिसमें मिला दो उसी के रंग में रंंग जाता।
अब वह समय आ गया है, जब इस रंंग हीन अमृत को बचाने की आवश्यकता है, नहीं तो हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या जवाब देंंगे? कौन- सा मुँह दिखाएंगे?
जय हिंद! जय भारत!!
डाॅ.उमश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
जल से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जल से ही कई बार सृष्टि का विनाश भी हुआ है। 'मनु-स्मृति' में इसका जीवंत प्रमाण मिलता है। जल के साथ सृष्टि का अत्यंत गहरा संबंध है। जल के अभाव में प्राणी प्यास से मर जाता है, तो वहीं दूसरी ओर जल की अधिकता प्राणियों का सर्वनाश भी कर सकता है। मौजूदा समय में समस्या यह है कि प्राणियों को डुबाने केे लिए तो पर्याप्त जल है,पर पीने के लिए जल का अभाव है। जानकारों के मुताबिक वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) में वृृद्धि के कारण ग्लेेेेशियर बहुत तेेेेजी से पिघल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जल-स्तर में तजी से वृद्धि हो रही है। आगामी 25-30 वर्षों में भारत की मायानगरी मुंबई, चेेेन्नई समेत कई शहर जलमग्न हो जाएंगे!
यह सर्वविदित है कि सृष्टि मेंं जल का अकूूूत भंडार है, परन्तु माात्र 3% जल ही पीने के लायक है। शेष जल या तो खारे हैं या प्रदूषित। 3% जल जो कि नदियों, तालाबों, कुँँओं तथा भूमिगत जल के रूप में उपलब्ध है, उसका 60% से अधिक भाग कृषि-सिंचाई तथा कल कारखानों में उपयोग कर लिया जाता है। मतलब 3% जल का 40% भाग हम पीने तथा अन्य घरेलू कार्यों में उपयोग करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह कि यह 3% जल ही हमारा जीवन है। अब सबाल यह है कि हम अपने जीवन को कैैसे बचाएँ। शहरीकरण और बाजारवाद के विकास के साथ ही क्या यह संभव है। और खासकर तब, जब समाज कर्तव्यहीन हो चुुका हो। सबको अपनी पड़ी हो।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई, आवास तथा सड़कों, नालों के पक्कीकरण के कारण भूमिगत जल का रीसाइक्लिंग नहींं हो पा रहा है।हम पानी निकाल तो रहेे हैं, पर डाल नहीं रहेे हैं । वर्षा -जल के संरक्षण का भी कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। नदियों, तालाबों की साफ- सफाई की जगह उन्हें नष्ट किये जा रहे हैं। कुँए की स्थिति डायनासोर जैैसी हो गयी है। बीस-पच्चीस वर्षों बाद तो हमारे बच्चे कुँए के बारे में किताबोंं में ही पढेंगे, क्योंकि कुुुँए बहुत तेजी से कूड़ेदान में परिवर्तित हो रहे हैं।
जानकारों ने यह भी बताया है कि अगर
इसी प्रकार सबकुछ चलता रहा तो 2040 ई. तक भूमिगत जल लगभग समाप्त हो जाएगा।
कोशी के गर्भ से पैदा होनेे के कारण मैंने नजर के सामनेे से लोगों को डूब कर मरते हुए देखा है और शहर में रहकर लोगों को पानी के लिए लड़ते भी देखा है।संभावना व्यक्त की जा रही है कि तीसरा विश्वयुद्ध तेल के लिए नहीं, पानी के लिए होगा। मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र मेंं इसकी बानगी देखी जा सकती है,जहाँ लोग पानी के लिए मैराथन दौड़ में सुबह से ही शरीक जातेे हैं। वहीं दूसरी ओर पानी के अभाव में किसानों की खेती चौपट हो रही है और वे आत्महत्या कर रहे हैैं।
हमारे देश की करीब 70%आबादी को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है, लेकिन 10% आबादी एक लीटर साफ पानी पाने के फेर मेंं तीन लीटर पानी यूूँ ही बहा रही हैै। साथ ही हमारी ही जमीन से पानी निकाल कर हमारे ही हाथ में बीस रूपये लीटर पानी थमाने की साजिश चल रही है। शहरी क्षेत्रों में यह सब चालू है।शहरी अमीर अपनी जमीन में बोरिंग धसाकर अपने लिए तो पर्याप्त खींंच लेते हैंं, पर आसपास के गरीबों के चापाकल से केवल हवा निकलता हैै। और यदि एकाध लीटर पानी निकल भी आए तो उसमें आर्सेनिक की मात्रा पाया जाता है, जिसे पीकर बीमार होना लगभग तय है।
पानी, प्रकृति प्रदत्त सबसे खूबसूरत तोहफा है। ऐसा जीवनदायी अमृत, जिसका अपना कोई रंग नहीं। जिसमें मिला दो उसी के रंग में रंंग जाता।
अब वह समय आ गया है, जब इस रंंग हीन अमृत को बचाने की आवश्यकता है, नहीं तो हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या जवाब देंंगे? कौन- सा मुँह दिखाएंगे?
जय हिंद! जय भारत!!
डाॅ.उमश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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