ज्वलंत मुद्दा
मनुष्य एक उद्योगशील प्राणी है। उसकी यही विशेषता उसे खानाबदोश से सभ्य बनाया है। प्रकृति के साथ वह अनुुुुकूलन भी किया है और संघर्ष भी। जंगलों में जानवरों का शिकार कर अपनी भूख मिटाने वाला, पेड़ केे पत्तों और खालों से अपनी नग्नता को ढँकने वाला, पहाड़ों की खोह तथा बिलों में रहने वाला मनुष्य आज चाँद और मंगल पर बसने की योजना बना रहा है। यह सब उसकी संघर्षशीलता का ही परिणाम है। कहा जाता है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। मनुष्य अपनी जरूरतोंं के अनुसार नित नवीन वस्तुओं का निर्माण करता गया,जिनसे उसकी जीवन शैली में परिवर्तन आता गया।
विकास की इस अनंत यात्रा के क्रम में मनुष्य ज्यों- ज्यों प्रकृति के रहस्य को जानता गया, वह त्यों-त्यों प्रकृति पर विजय प्राप्त करता गया। मनुष्य के भीतर इसके साथ-साथ एक दंभ का भी विकास होता गया। वह प्रकृति पर विजय पाकर स्वयं को सर्वशक्तिमान समझ लिया। इस चक्कर में भूल ही गया कि वह विकास के साथ ही विनाश को भी सृजित कर रहा है। जंगलों को काटकर खेेतों का निर्माण, नदियों में बांध का निर्माण, पर्वतों को काट कर मार्ग का निर्माण तब से अब तक बदस्तूर जारी है।अब जब मनुष्य को इसकी परिणति भोगना पड़ रहा है, तब वह कैंसर का रूप लिए इस घाव पर मरहम का लेप लगाना शुरू किया है।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई के पश्चात जब बेेमौसम बरसात, बाढ़ और सुखाड़ का सामना उसे करना पड़ रहा है तो उसने सड़कों केे किनारे पेड़ रोपना आरंभ किया है, लेकिन जिस तरह मौसी से पिताजी का विवाह करा देनेे सेे माँ की कमी पूरी नहीं हो सकती , ठीक उसी प्रकार सड़कों के किनारे चंद पेेड़ लगाना जंगल का विकल्प नहीं हो सकता है। जंगलों में एक जीवन- श्रृंखला का विकास होता है, वह सड़क किनारे संभव नहीं। जंगलों में हजारों तरह के पेेड़-पौधे, जडी़-बूटियों , लताओं का विकास स्वाभाविक रूप से होता है, अतएव जंगल का विकल्प जंगल ही हो सकता है।
पहाड़ों को तोड़कर मार्ग का निर्माण, या अन्य तरह से उपयोग करना भी प्रकृति की प्रकृति को बिगाड़ना है। नदियों की स्वाभाविकता को बिगाड़ कर बिजली का उत्पादन किया जा रहा है, जिससे उसमें विकसित होने वाली जीवन- श्रृंखला का तेजी से ह्रास हो रहा है। धरती पर तो कूूूूड़े का अंबार लग ही गया है, समुद्र भी अब इसका शिकार व्यापक रूप से हो गया है। वहाँ भी पालिथिन का ढेर लग जाने से समुद्री जीवन-क्रम प्रभावित हो रहा है। अनेेेक समुद्री जीव गिद्ध की भाँँति लुप्त हो रहे हैं।
प्रदूषण देश और दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है, जिस पर वैश्विक स्तर पर चिंतन -मनन किया जा रहा है।अब शुद्ध जल, वायु और खाद्य-पदार्थ का मिलना दुर्लभ है। स्वर्ग -सी धरती को मानव नेे स्वयं नरक बनाया हैै। और अब भी उनमें पूरी जागृति नहीं आयी है। सभी अपने दायित्व का पालन करने के बजाय एक- दूूसरे पर दोषारोपण करने में लगे हैं।
अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर विज्ञान ने जितना विकास किया है, उतना ही उसने विनाश को भी सृजित किया है। अब जबकि धरती पर जीवन को कायम रखने में उसेे पूूरी शक्ति लगानी थी, वह चांद और मंंगल पर जीवन बसाने का स्वप्न देेख रहा है।
आज की इस विषम परिस्थितियों में आवश्यकता है सामाजिक जागरूकता की। सरकार के भरोसे पर धरती या प्रकृृृति को संरक्षित करने का स्ववप्न हमें त्यागना होगा। यह धरती अमूल्य है। स्वर्ग का बास इधर ही है। हमें इस स्वर्ग के स्वर्गत्व बचाना को होगा, अपने लिए नहीं भी तो कमसे- कम अपनी अगली पीढ़ियोंं के लिए। अन्यथा हम उन्हें नहीं बता सकेंगे कि हमने विकास किया या विनाश.......???????
जय हिंद ! जय भारत!
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
मनुष्य एक उद्योगशील प्राणी है। उसकी यही विशेषता उसे खानाबदोश से सभ्य बनाया है। प्रकृति के साथ वह अनुुुुकूलन भी किया है और संघर्ष भी। जंगलों में जानवरों का शिकार कर अपनी भूख मिटाने वाला, पेड़ केे पत्तों और खालों से अपनी नग्नता को ढँकने वाला, पहाड़ों की खोह तथा बिलों में रहने वाला मनुष्य आज चाँद और मंगल पर बसने की योजना बना रहा है। यह सब उसकी संघर्षशीलता का ही परिणाम है। कहा जाता है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। मनुष्य अपनी जरूरतोंं के अनुसार नित नवीन वस्तुओं का निर्माण करता गया,जिनसे उसकी जीवन शैली में परिवर्तन आता गया।
विकास की इस अनंत यात्रा के क्रम में मनुष्य ज्यों- ज्यों प्रकृति के रहस्य को जानता गया, वह त्यों-त्यों प्रकृति पर विजय प्राप्त करता गया। मनुष्य के भीतर इसके साथ-साथ एक दंभ का भी विकास होता गया। वह प्रकृति पर विजय पाकर स्वयं को सर्वशक्तिमान समझ लिया। इस चक्कर में भूल ही गया कि वह विकास के साथ ही विनाश को भी सृजित कर रहा है। जंगलों को काटकर खेेतों का निर्माण, नदियों में बांध का निर्माण, पर्वतों को काट कर मार्ग का निर्माण तब से अब तक बदस्तूर जारी है।अब जब मनुष्य को इसकी परिणति भोगना पड़ रहा है, तब वह कैंसर का रूप लिए इस घाव पर मरहम का लेप लगाना शुरू किया है।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई के पश्चात जब बेेमौसम बरसात, बाढ़ और सुखाड़ का सामना उसे करना पड़ रहा है तो उसने सड़कों केे किनारे पेड़ रोपना आरंभ किया है, लेकिन जिस तरह मौसी से पिताजी का विवाह करा देनेे सेे माँ की कमी पूरी नहीं हो सकती , ठीक उसी प्रकार सड़कों के किनारे चंद पेेड़ लगाना जंगल का विकल्प नहीं हो सकता है। जंगलों में एक जीवन- श्रृंखला का विकास होता है, वह सड़क किनारे संभव नहीं। जंगलों में हजारों तरह के पेेड़-पौधे, जडी़-बूटियों , लताओं का विकास स्वाभाविक रूप से होता है, अतएव जंगल का विकल्प जंगल ही हो सकता है।
पहाड़ों को तोड़कर मार्ग का निर्माण, या अन्य तरह से उपयोग करना भी प्रकृति की प्रकृति को बिगाड़ना है। नदियों की स्वाभाविकता को बिगाड़ कर बिजली का उत्पादन किया जा रहा है, जिससे उसमें विकसित होने वाली जीवन- श्रृंखला का तेजी से ह्रास हो रहा है। धरती पर तो कूूूूड़े का अंबार लग ही गया है, समुद्र भी अब इसका शिकार व्यापक रूप से हो गया है। वहाँ भी पालिथिन का ढेर लग जाने से समुद्री जीवन-क्रम प्रभावित हो रहा है। अनेेेक समुद्री जीव गिद्ध की भाँँति लुप्त हो रहे हैं।
प्रदूषण देश और दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है, जिस पर वैश्विक स्तर पर चिंतन -मनन किया जा रहा है।अब शुद्ध जल, वायु और खाद्य-पदार्थ का मिलना दुर्लभ है। स्वर्ग -सी धरती को मानव नेे स्वयं नरक बनाया हैै। और अब भी उनमें पूरी जागृति नहीं आयी है। सभी अपने दायित्व का पालन करने के बजाय एक- दूूसरे पर दोषारोपण करने में लगे हैं।
अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर विज्ञान ने जितना विकास किया है, उतना ही उसने विनाश को भी सृजित किया है। अब जबकि धरती पर जीवन को कायम रखने में उसेे पूूरी शक्ति लगानी थी, वह चांद और मंंगल पर जीवन बसाने का स्वप्न देेख रहा है।
आज की इस विषम परिस्थितियों में आवश्यकता है सामाजिक जागरूकता की। सरकार के भरोसे पर धरती या प्रकृृृति को संरक्षित करने का स्ववप्न हमें त्यागना होगा। यह धरती अमूल्य है। स्वर्ग का बास इधर ही है। हमें इस स्वर्ग के स्वर्गत्व बचाना को होगा, अपने लिए नहीं भी तो कमसे- कम अपनी अगली पीढ़ियोंं के लिए। अन्यथा हम उन्हें नहीं बता सकेंगे कि हमने विकास किया या विनाश.......???????
जय हिंद ! जय भारत!
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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