मैं बागी हूँ
जी हाँ! मैं बागी हूँ,
क्योंकि मैं नहीं बह सका
उस धारा के साथ,
जिसे लोग मुख्य धारा कहते हैं
मैं नहीं बन सका उस भीड़ का हिस्सा
जिसमें अंधे, बहरे और गूँगे शामिल हैं
मैं नहीं मार सका अपने भीतर के सत्य को
मैं नहीं पूज सका किसी धन-सेठों के पैर
मैं नहीं पूज सका पत्थरों में छिपे भगवान् को
जो बुलाने पर भी नहीं आते।
मैंनेे तोड़ लिया है रिस्ता उनसे भी
जो उन्हें पूजते हैं।
मैंने बना लिया है अपना अलग देवालय
जिसमें मनुष्य की मूर्तियां सजी हैं
लोगों ने फिर भी कहा है मुझे बागी,
लेकिन यह बागीपन अब मेरी जिंदगी है।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
जी हाँ! मैं बागी हूँ,
क्योंकि मैं नहीं बह सका
उस धारा के साथ,
जिसे लोग मुख्य धारा कहते हैं
मैं नहीं बन सका उस भीड़ का हिस्सा
जिसमें अंधे, बहरे और गूँगे शामिल हैं
मैं नहीं मार सका अपने भीतर के सत्य को
मैं नहीं पूज सका किसी धन-सेठों के पैर
मैं नहीं पूज सका पत्थरों में छिपे भगवान् को
जो बुलाने पर भी नहीं आते।
मैंनेे तोड़ लिया है रिस्ता उनसे भी
जो उन्हें पूजते हैं।
मैंने बना लिया है अपना अलग देवालय
जिसमें मनुष्य की मूर्तियां सजी हैं
लोगों ने फिर भी कहा है मुझे बागी,
लेकिन यह बागीपन अब मेरी जिंदगी है।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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