कहानी
विमली से मार खाकर धनवंती और सुुुुभाष रोते-रोते कब का न सो गये थे। पर विमली ?........विमली को नींद कहाँ से आती? कहींं का गुुस्सा कहीं उतार देनेे से शांति मिलती तो मिल गयी होती उसेे शांति। दोनों बच्चों के गाल पर आँसू के सूूूूखे हुए निशान उसे व्याकुल किये जा रहा था- एक पाँच टके की घड़ी और दो टके का गेंद ही तो मांगा था वह। कौन-सा जुल्म कर दिया! पाँच टके की कचरी- मूढ़ी ही तो मांगी थी वह, कौन- सा हाथी-घोड़ा मांग लिया।
वह कहती है कि ये दोनों बच्चे ही उसके प्राण हैं। उनकी दो आँखें हैं तो क्या उनके लिए इतना भी न कर सकती!
विमली उठकर बैठ गयी और मुँँह में साड़ी का पल्लू ठूँसकर फफक पड़ी! दिन-रात वह जिस भगवान् की मूूर्तियाँ गढ़ती है, उसने न जाने कितनों का बेेरा पार लगा दिया, पर वह न जाने किस गाय के घर में आग लगा आई थी! दिन-रात खटने पर भी पेट नहीं भरता।
आज तो ग्राहकों की ताक में उनकी आँखें पथरा गयीं ! सब कुछ तो बिक रहे थे मेले में .......पर भगवान्?.......भगवान् को खरीदने कोई नहीं आता!
विमली हारकर दाम तोड़ दी। तीस का माल बीस लगा दी, पर ग्राहक तो आठ-दस में माल पटाने पर अडे़ थे। इनकी नाक टेढी़ है, दूसरा दो...... अरे, इसका तो रंग ही झड़ रहा है.......वो वाला दो......वो उससेे आगे......कितने का है?
"बीस का।"
"अरे क्या लूूूट मची है! दस का माल बीस में?"
"सबकुछ महँगा हो गया है साहेब, हम लोग क्या करें?"
"क्या महँगा हो गया? मिट्टी का सौदा है।"
"रंग-टीप, मेेहनताना नहीं जोड़ते साहेब?"
"महीने भर में तो सब रंग उतर जाएगा।"
"नहीं उतरेगा साहेब, पकिया रंग है।"
विमली तारणहार का पक्ष रखते-रखते आजिज हो गयी थी।
दोनों बच्चे महीन कूची से मूर्तियों पर रंग चढ़ाने में डूबे हुए थे। कभी-कभी उन्हें सामने से गुजरते बच्चों के हाथ के खिलौने ललचा जाते, लेेेकिन फिर वे धैर्य के साथ अपने काम मेंं मशगूल हो जाते।
विमली आने-जाने वाले ग्राहकों की आँखों मेंं ललचाई नजरों से झाँक रही थी। कोई एक क्षण के लिए इधर देखता तो वह सचेेत होकर कहती- "लीजिए न दीदी, दुुर्गा मैया,सरस्वती मैैया, लछमी माता, गणेश जी, कृृृषण भगवान्.........लीजिए न!"
जाने वाले मुँह चिढ़ाकर चले जाते।
बच्चे थे कि जिसका मन रंग-बिरंगे भगवान् को देेेखकर ललच जाता, पर अगले ही क्षण माँ बोलती- "मिट्टी का है, दो दिन में टूूूटकर बराबर हो जाएगा। चल चुपचाप।"
विमली उसे टेढ़ी आँखों से देखकर शूून्य में खो जाती!
शाम होते-होते ग्राहकों भीड़ उमर पड़ी, पर उसके पास गाहे-बगाहे कोई रूकता। कुछ देर बाद उसे मालूम हुआ कि मेेले मेें चीनी मिट्टी के रंग-बिरंगे भगवान् बिक रहे हैं। उसके पास भारी भीड़ लगी है। एकदम सस्ते दामों पर । लोग लूूूट रहे हैं।
अब तक वह साठ-सत्तर रुपये का माल बेेच पायी थी। माथा भारी हो गया- अगर यही हाल रहा तो रंगवाले..... मेेेेहनताना.....घर खर्ची.....!
विमली को लग गया कि अब कुछ बिकने वाला नहीं, वह सबकुछ समेट कर पथिया में रखी और फलिया (विछावन) मोड़कर बेेटी के हाथ में थमा दी।
वह माथे पर पथिया लेेेकर चली ही थी कि दोनों बच्चे ने आगे से घेर लिया। एक को घड़ी और गेंद चाहिए तो दूसरे को कचरी-मूूूूढ़ी।
माँ ने उन्हें ऐसा डपटा कि दोनों घर तक मौनव्रत धारण किये रहे। घर में खिचड़ी बनी, दोनों में से किसी ने नहीं खाया।माँ दुलारती रही, पुचकारती रही.. ....अपनी सपथ खाकर कल दिलाने का वादा करती रही,पर कोई लाभ नहीं!
वह खुशामद करके हार गयी, तो थाली उठाकर कोठी के कंधे पर रखी और दोनों को जी भर कर पीट दी - "मरने वाला तो मर गया, सरंग का राजा हुआ। तुम दोनों को भी उठा लेेता तो भला होता.....अकेला जान कहीं नदी- पोखर में डूूूब मरती...तंंग आ गयी जिनगी से!"
विमली को सरंग का राजा याद हो आया, जो चार साल पहले उसे छोड़कर चला गया था! वह अतीत में चार कदम और पीछे चली गई। छह साल पहले की दीपावली की वह रात, जब चूल्हा न जला था। चार साल की धनवंती रोटी मांग रही थी और दो साल का सुुभाष दूूूध के लिए रिरिया रहा था। और वेे एक असक्त पिता की भाँति सबकुछ देख-सुन रहे थे। दिनभर पति-पत्नी सड़क केे किनारे मूर्तियाँ पसारे रहे, पर एक भी न बिका! लोग चीनी मिट्टी केे लक्ष्मी- गणेश खरीद रहे थे। उनके महीने भर के सपनों पर पानी फिर गया। दीया, मलसी, कुलिया, धुपदानी गढ़़ने के बजाय उन्होंने लक्ष्मी-गणेेश, शिव-पार्वती, कार्तिक और कृष्ण भगवान् तो गढ़ लिया, पर उनका खरीदार न मिला!
सुबह उठकर जगदीश ईटा गाड़ा में काम करने चला गया। शाम को लौटा तो दो सौ रूपये लेकर। घर में खुशहाली आ गयी। वह अपना पुुस्तैनी काम छोड़कर मजदूूरी करने लगा। कुंभकारी से सधा हुआ हाथ। वह साल भर में ही राजमिस्त्री हो गया। लोगों की नजर में उसका मान-सम्मान बढ़ गया। मिट्टी के कारोबार से मुक्ति मिल गयी। चेहरे पर रंग चढ़ आया। विमली रंंग-बिरंग की साड़ी पहननेे लगी। बच्चे स्कूल जाने लगे। पुुस्तैनी काम करने वाले जात वाले उनसे जलने लगे।
लेकिन जगदीश की खुशी को इतनी जल्दी किसी की नजर लग जाएगी, किसे पता था!
उस दिन विमली लाल साडी़ पहनकर तुलसी-चौड़ा में शाम का दीया दिखा रही थी कि तभी हल्ला हुुुआ। विमली कुछ समझ पाती , इससे पहले चार मजदूर खून से लथपथ जगदीश की लाश लिए आँगन में आ गये। पीछे से पूरा गाँव उलट पड़ा। जगदीश महादेव मंदिर का गुम्बद बनाते समय सीढ़ी सेे फिसलकर गिर पड़ा था! स्पाॅट डेथ!!
विमली का कलेजा फट गया। मुहल्लेे की महिलाएँ रोकर उसका साथ दे रही थी। बच्चे पत्थर हो गये!
जात वालों का कहना था कि जो अपनी चाल छोड़कर खजन चिरैंया का चाल पकड़ता है, उसकी यही गति होती है।
बोलने वाले को कौन समझाए कि जगदीश को पुुस्तैनी धंंधे से वितृष्णा नहीं हुई थी। वह तो अब भी चाक को संभाल कर रखा था। वह तो उस दिन के इंंतजार में था, जब अपनी सरकार चाइनीज माल पर रोक लगाएगी। घरेलूू उद्योग-धंधों का विकास होगा। असली हिन्द-स्वराज का आगमन होगा।
जगदीश के नहीं रहने पर विमली ने गुजारे के लिए फिर से पुुस्तैनी धंंधा शुरू किया। वह फिर से गढ़ने लगी- तारणहार की रंग-बिरंगी मूूर्तियाँ।
विमली जी भरकर रो लेने के बाद दोनों बच्चे को कलेजे से साट कर लेट गयी। लेकिन उनकी आँखें धरेन पर रखे तगारी और करनी पर टिकी थीं, जिन्हें लेकर धनवंती के बाबू रोज़ काम पर जाते थे।
विमली शाम को तगारी धोकर चौकी केे नीचे रखी और साबुन सेे रगड़ कर नहाने लगी। साड़ी में कई जगह सीमेेंट के दाग लगे थे, पर उसके चेहरे खिल रहेे थे। हृदय में उल्लास था।
आज विजयादशमी था। सभी जात वाली महिलाएँ अपना-अपना पथिया लेकर मेला जा चुकी थीं, पर विमली को अब उनसे क्या मतलब ? उसने तो मजदूरी मेें मिले तीन सौ रूपये से दोनों बच्चोंं का मन भर दिया। अब वे खिलौने और मिठाईयाँ संभाल नहीं पा रहे हैंं। आज कबीर होते तो शायद यही कहते- 'तू क्या रौंदे मोर'।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
विमली से मार खाकर धनवंती और सुुुुभाष रोते-रोते कब का न सो गये थे। पर विमली ?........विमली को नींद कहाँ से आती? कहींं का गुुस्सा कहीं उतार देनेे से शांति मिलती तो मिल गयी होती उसेे शांति। दोनों बच्चों के गाल पर आँसू के सूूूूखे हुए निशान उसे व्याकुल किये जा रहा था- एक पाँच टके की घड़ी और दो टके का गेंद ही तो मांगा था वह। कौन-सा जुल्म कर दिया! पाँच टके की कचरी- मूढ़ी ही तो मांगी थी वह, कौन- सा हाथी-घोड़ा मांग लिया।
वह कहती है कि ये दोनों बच्चे ही उसके प्राण हैं। उनकी दो आँखें हैं तो क्या उनके लिए इतना भी न कर सकती!
विमली उठकर बैठ गयी और मुँँह में साड़ी का पल्लू ठूँसकर फफक पड़ी! दिन-रात वह जिस भगवान् की मूूर्तियाँ गढ़ती है, उसने न जाने कितनों का बेेरा पार लगा दिया, पर वह न जाने किस गाय के घर में आग लगा आई थी! दिन-रात खटने पर भी पेट नहीं भरता।
आज तो ग्राहकों की ताक में उनकी आँखें पथरा गयीं ! सब कुछ तो बिक रहे थे मेले में .......पर भगवान्?.......भगवान् को खरीदने कोई नहीं आता!
विमली हारकर दाम तोड़ दी। तीस का माल बीस लगा दी, पर ग्राहक तो आठ-दस में माल पटाने पर अडे़ थे। इनकी नाक टेढी़ है, दूसरा दो...... अरे, इसका तो रंग ही झड़ रहा है.......वो वाला दो......वो उससेे आगे......कितने का है?
"बीस का।"
"अरे क्या लूूूट मची है! दस का माल बीस में?"
"सबकुछ महँगा हो गया है साहेब, हम लोग क्या करें?"
"क्या महँगा हो गया? मिट्टी का सौदा है।"
"रंग-टीप, मेेहनताना नहीं जोड़ते साहेब?"
"महीने भर में तो सब रंग उतर जाएगा।"
"नहीं उतरेगा साहेब, पकिया रंग है।"
विमली तारणहार का पक्ष रखते-रखते आजिज हो गयी थी।
दोनों बच्चे महीन कूची से मूर्तियों पर रंग चढ़ाने में डूबे हुए थे। कभी-कभी उन्हें सामने से गुजरते बच्चों के हाथ के खिलौने ललचा जाते, लेेेकिन फिर वे धैर्य के साथ अपने काम मेंं मशगूल हो जाते।
विमली आने-जाने वाले ग्राहकों की आँखों मेंं ललचाई नजरों से झाँक रही थी। कोई एक क्षण के लिए इधर देखता तो वह सचेेत होकर कहती- "लीजिए न दीदी, दुुर्गा मैया,सरस्वती मैैया, लछमी माता, गणेश जी, कृृृषण भगवान्.........लीजिए न!"
जाने वाले मुँह चिढ़ाकर चले जाते।
बच्चे थे कि जिसका मन रंग-बिरंगे भगवान् को देेेखकर ललच जाता, पर अगले ही क्षण माँ बोलती- "मिट्टी का है, दो दिन में टूूूटकर बराबर हो जाएगा। चल चुपचाप।"
विमली उसे टेढ़ी आँखों से देखकर शूून्य में खो जाती!
शाम होते-होते ग्राहकों भीड़ उमर पड़ी, पर उसके पास गाहे-बगाहे कोई रूकता। कुछ देर बाद उसे मालूम हुआ कि मेेले मेें चीनी मिट्टी के रंग-बिरंगे भगवान् बिक रहे हैं। उसके पास भारी भीड़ लगी है। एकदम सस्ते दामों पर । लोग लूूूट रहे हैं।
अब तक वह साठ-सत्तर रुपये का माल बेेच पायी थी। माथा भारी हो गया- अगर यही हाल रहा तो रंगवाले..... मेेेेहनताना.....घर खर्ची.....!
विमली को लग गया कि अब कुछ बिकने वाला नहीं, वह सबकुछ समेट कर पथिया में रखी और फलिया (विछावन) मोड़कर बेेटी के हाथ में थमा दी।
वह माथे पर पथिया लेेेकर चली ही थी कि दोनों बच्चे ने आगे से घेर लिया। एक को घड़ी और गेंद चाहिए तो दूसरे को कचरी-मूूूूढ़ी।
माँ ने उन्हें ऐसा डपटा कि दोनों घर तक मौनव्रत धारण किये रहे। घर में खिचड़ी बनी, दोनों में से किसी ने नहीं खाया।माँ दुलारती रही, पुचकारती रही.. ....अपनी सपथ खाकर कल दिलाने का वादा करती रही,पर कोई लाभ नहीं!
वह खुशामद करके हार गयी, तो थाली उठाकर कोठी के कंधे पर रखी और दोनों को जी भर कर पीट दी - "मरने वाला तो मर गया, सरंग का राजा हुआ। तुम दोनों को भी उठा लेेता तो भला होता.....अकेला जान कहीं नदी- पोखर में डूूूब मरती...तंंग आ गयी जिनगी से!"
विमली को सरंग का राजा याद हो आया, जो चार साल पहले उसे छोड़कर चला गया था! वह अतीत में चार कदम और पीछे चली गई। छह साल पहले की दीपावली की वह रात, जब चूल्हा न जला था। चार साल की धनवंती रोटी मांग रही थी और दो साल का सुुभाष दूूूध के लिए रिरिया रहा था। और वेे एक असक्त पिता की भाँति सबकुछ देख-सुन रहे थे। दिनभर पति-पत्नी सड़क केे किनारे मूर्तियाँ पसारे रहे, पर एक भी न बिका! लोग चीनी मिट्टी केे लक्ष्मी- गणेश खरीद रहे थे। उनके महीने भर के सपनों पर पानी फिर गया। दीया, मलसी, कुलिया, धुपदानी गढ़़ने के बजाय उन्होंने लक्ष्मी-गणेेश, शिव-पार्वती, कार्तिक और कृष्ण भगवान् तो गढ़ लिया, पर उनका खरीदार न मिला!
सुबह उठकर जगदीश ईटा गाड़ा में काम करने चला गया। शाम को लौटा तो दो सौ रूपये लेकर। घर में खुशहाली आ गयी। वह अपना पुुस्तैनी काम छोड़कर मजदूूरी करने लगा। कुंभकारी से सधा हुआ हाथ। वह साल भर में ही राजमिस्त्री हो गया। लोगों की नजर में उसका मान-सम्मान बढ़ गया। मिट्टी के कारोबार से मुक्ति मिल गयी। चेहरे पर रंग चढ़ आया। विमली रंंग-बिरंग की साड़ी पहननेे लगी। बच्चे स्कूल जाने लगे। पुुस्तैनी काम करने वाले जात वाले उनसे जलने लगे।
लेकिन जगदीश की खुशी को इतनी जल्दी किसी की नजर लग जाएगी, किसे पता था!
उस दिन विमली लाल साडी़ पहनकर तुलसी-चौड़ा में शाम का दीया दिखा रही थी कि तभी हल्ला हुुुआ। विमली कुछ समझ पाती , इससे पहले चार मजदूर खून से लथपथ जगदीश की लाश लिए आँगन में आ गये। पीछे से पूरा गाँव उलट पड़ा। जगदीश महादेव मंदिर का गुम्बद बनाते समय सीढ़ी सेे फिसलकर गिर पड़ा था! स्पाॅट डेथ!!
विमली का कलेजा फट गया। मुहल्लेे की महिलाएँ रोकर उसका साथ दे रही थी। बच्चे पत्थर हो गये!
जात वालों का कहना था कि जो अपनी चाल छोड़कर खजन चिरैंया का चाल पकड़ता है, उसकी यही गति होती है।
बोलने वाले को कौन समझाए कि जगदीश को पुुस्तैनी धंंधे से वितृष्णा नहीं हुई थी। वह तो अब भी चाक को संभाल कर रखा था। वह तो उस दिन के इंंतजार में था, जब अपनी सरकार चाइनीज माल पर रोक लगाएगी। घरेलूू उद्योग-धंधों का विकास होगा। असली हिन्द-स्वराज का आगमन होगा।
जगदीश के नहीं रहने पर विमली ने गुजारे के लिए फिर से पुुस्तैनी धंंधा शुरू किया। वह फिर से गढ़ने लगी- तारणहार की रंग-बिरंगी मूूर्तियाँ।
विमली जी भरकर रो लेने के बाद दोनों बच्चे को कलेजे से साट कर लेट गयी। लेकिन उनकी आँखें धरेन पर रखे तगारी और करनी पर टिकी थीं, जिन्हें लेकर धनवंती के बाबू रोज़ काम पर जाते थे।
विमली शाम को तगारी धोकर चौकी केे नीचे रखी और साबुन सेे रगड़ कर नहाने लगी। साड़ी में कई जगह सीमेेंट के दाग लगे थे, पर उसके चेहरे खिल रहेे थे। हृदय में उल्लास था।
आज विजयादशमी था। सभी जात वाली महिलाएँ अपना-अपना पथिया लेकर मेला जा चुकी थीं, पर विमली को अब उनसे क्या मतलब ? उसने तो मजदूरी मेें मिले तीन सौ रूपये से दोनों बच्चोंं का मन भर दिया। अब वे खिलौने और मिठाईयाँ संभाल नहीं पा रहे हैंं। आज कबीर होते तो शायद यही कहते- 'तू क्या रौंदे मोर'।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युुवा रचनाकार
इस कहानी में सलाह,उल्लास और हृदय को स्पर्श करने वाली घटनाओ को दिखाया गया । जो हमे बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद सर जी। आगे भी आप यदि कोइ कहानी लिखे तो सुझाव के रूप में वर्तमान से जरूर जोड़ने का प्रयास करेंगे।।
ReplyDelete