देश- प्रदेश ही नहीं संपूर्ण विश्व विकट संकट में है। संकट ऐसा, जिससे सामना करने के सारे हथियार नाकाम हो रहे हैं। अगर निकट भविष्य में इस संकट से मुक्ति पा भी लेते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम का सामना हमें करना ही होगा। चूँकि इस वैश्विक महामारी से निजात पाने के बाद जो आर्थिक संकट उत्पन्न होने वाला है उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। बात भारत की करें तो विदित हो कि एक ओर हम जहाँ हम चांद और मंगल पर जीवन बसाने की बात सोच रहे थे और दूसरी ओर भारत को पूर्णतः 'डिजिटलीकरण' करने की तैयारी कर रहे थे ऐसे वक्त पर कोरोना ने आकर सबकुछ चौपट कर दिया। चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ है। और इस सन्नाटे के बीच बड़ी संख्या में मजदूरों का अपने घर और अपनी मिट्टी पर वापसी कालांतर में अत्यंत त्रासद सिद्ध हो सकती है। यह मानने में किसी को संदेह नहीं होगा कि भारत की आर्थिक गाड़ी कम्प्यूटर से नहीं मेहनतकश मजदूरों-कामगारों के बल गतिमान है। इसकी गति कायम रखने के लिए मजदूरों का पलायन रोकने की जरूरत थी, पर कंपनियों या उद्योगों या घरेलू काम कराने वाले संवेदनहीन मालिकों ने उनके लिए दो वक्त के रोटी-पानी का इंतजाम न कर सका। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और लुधियाना जैसे बड़े शहरों की चमक कायम रखने वाले बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखंड, उड़ीसा आदि राज्यों के मेहनतकश मजदूरों की जिस तरह घर वापसी हो रही है, वह चिंताजनक है। और ये मजदूर जो हजारों मील की दूरी पैदल ही नाप कर अपनी मातृभूमि पर पहुँच रहे हैं, तथा अपनी धरती का नमन् कर रहे हैं, और फिर परदेश नहीं जाने की कसमें खा रहे हैं, ये भारी परिवर्तन के संकेत हैं।
ये मजदूर इसलिए भी कसमें खा रहे हैं, चूँकि वहाँ उन्हें अपमानित होकर जीना पड़ रहा था। उनकी पीड़ा को किसी ने समझने का प्रयास नहीं किया। न उनके श्रम पर मोटे होने वाले मालिक ने और न सरकार ने। काम के घंटे और मजदूरी की राशि तय नहीं होने के कारण भी असंगठित क्षेत्रों में इनका जबर्दस्त शोषण किया गया है।
मैं भारी परिवर्तन की बात कर रहा था। वह परिवर्तन दिखेगा कृषि के क्षेत्र में, लौटेगी फिर से धरती की हरियाली और छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों का पुनः विकास होगा। अतएव इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन होने की गारंटी है।लेकिन इसके इतर चमकदार शहरों में मरघटी सन्नाटा होगा। ऐसे में कार्पोरेट कंपनियों के पास उन मजदूरों की मातृभूमि तक उठकर आने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होगा।
अब सरकार को चाहिए कि वह इन मजदूरों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार को रोजगार दिलाए। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को विकसित करे। उन्नत खाद और बीज ससमय उपलब्ध कराए, सिंचाई का समुचित प्रबंध करे, नकदी फसलों की खेती को बढ़ावा दे, उत्पादित सामग्रियों की सरकारी स्तरों पर खरीद किया जाए, किसानों को सहजता के साथ ऋण उपलब्ध कराया जाए और फसलों के बरबाद होने पर उसे आवश्यक सबसिडी दी जाय।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
संपर्क : 6201464897
ये मजदूर इसलिए भी कसमें खा रहे हैं, चूँकि वहाँ उन्हें अपमानित होकर जीना पड़ रहा था। उनकी पीड़ा को किसी ने समझने का प्रयास नहीं किया। न उनके श्रम पर मोटे होने वाले मालिक ने और न सरकार ने। काम के घंटे और मजदूरी की राशि तय नहीं होने के कारण भी असंगठित क्षेत्रों में इनका जबर्दस्त शोषण किया गया है।
मैं भारी परिवर्तन की बात कर रहा था। वह परिवर्तन दिखेगा कृषि के क्षेत्र में, लौटेगी फिर से धरती की हरियाली और छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों का पुनः विकास होगा। अतएव इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन होने की गारंटी है।लेकिन इसके इतर चमकदार शहरों में मरघटी सन्नाटा होगा। ऐसे में कार्पोरेट कंपनियों के पास उन मजदूरों की मातृभूमि तक उठकर आने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होगा।
अब सरकार को चाहिए कि वह इन मजदूरों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार को रोजगार दिलाए। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को विकसित करे। उन्नत खाद और बीज ससमय उपलब्ध कराए, सिंचाई का समुचित प्रबंध करे, नकदी फसलों की खेती को बढ़ावा दे, उत्पादित सामग्रियों की सरकारी स्तरों पर खरीद किया जाए, किसानों को सहजता के साथ ऋण उपलब्ध कराया जाए और फसलों के बरबाद होने पर उसे आवश्यक सबसिडी दी जाय।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
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