हम करते रहेंगे चोट
तुम्हारी व्यवस्था पर
तुम्हारी संस्कृति पर
तुम्हारी सभ्यता पर
जैसे करते हैं हम चोट
भारी-भरकम हथौड़े से
गर्म- लाल लोहे पर ।
हम तोड़-फोड़ डालेंगे
शोषणकारी नीतियों को
रिवाजों और रीतियों को
जैसे तोड़ते हैं हम रोज
शिलाओं को हथौड़े से।
हमने ही बनाया है तुम्हारा
आरामगाह, तुम्हारी सड़कें
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा
हमने ही बनाये हैं तुम्हारे
देव-देवियों की प्रतिमाएँ
और न जाने क्या-क्या?
हमने ही जंगलों को काटकर
खेत बनाया, अन्न उपजाया,
जिसे खाकर इतराते हो तुम
हमने ही बुने-सिले हैं तुम्हारे कपड़े,
जिन्हें पहनकर नहीं पहचानते हमें
हमारे ही पसीने की कमाई खाकर
हमें रोज आँख दिखाते हो।
पानी नहीं है तुम्हारी आँखों में
हमारी भूख, प्यास और नग्नता से
तुम्हारे आनंद का विषय है,
पर इससे बेखबर नहीं हैं हम
खुल गयी हैं अब हमारी आँखें
मजदूर हैं हम मजबूर नहीं,
बनाएँगे नया समाज,नया देश
जिसपर काॅपीराइट हमारा होगा।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा,बिहार
दिनांक-01/05/2020
तुम्हारी व्यवस्था पर
तुम्हारी संस्कृति पर
तुम्हारी सभ्यता पर
जैसे करते हैं हम चोट
भारी-भरकम हथौड़े से
गर्म- लाल लोहे पर ।
हम तोड़-फोड़ डालेंगे
शोषणकारी नीतियों को
रिवाजों और रीतियों को
जैसे तोड़ते हैं हम रोज
शिलाओं को हथौड़े से।
हमने ही बनाया है तुम्हारा
आरामगाह, तुम्हारी सड़कें
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा
हमने ही बनाये हैं तुम्हारे
देव-देवियों की प्रतिमाएँ
और न जाने क्या-क्या?
हमने ही जंगलों को काटकर
खेत बनाया, अन्न उपजाया,
जिसे खाकर इतराते हो तुम
हमने ही बुने-सिले हैं तुम्हारे कपड़े,
जिन्हें पहनकर नहीं पहचानते हमें
हमारे ही पसीने की कमाई खाकर
हमें रोज आँख दिखाते हो।
पानी नहीं है तुम्हारी आँखों में
हमारी भूख, प्यास और नग्नता से
तुम्हारे आनंद का विषय है,
पर इससे बेखबर नहीं हैं हम
खुल गयी हैं अब हमारी आँखें
मजदूर हैं हम मजबूर नहीं,
बनाएँगे नया समाज,नया देश
जिसपर काॅपीराइट हमारा होगा।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा,बिहार
दिनांक-01/05/2020
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