लघुकथा :
उस दिन शारदा मैम से मेरी फिर ठन गयी। वह लगातार राग अलापे जा रही थी कि मेरा शोध-आलेख जिस रूप में है, उसी रूप में छापिये उसे। आपने जैसा कहा, उसके अनुरूप सुधार कर दिया गया है।
मैं अपनी जिद्द पर अड़ा था कि 'कफन कहानी का पुनर्पाठ' जैसे घिसे-पिटे विषयों पर आलेख छापकर हम अपनी पत्रिका का स्तर नहीं गिरा सकते। माफ कीजिए मैम। इस प्रकार का आग्रह नहीं कीजिए, हम मजबूर हैं। यह संपादक-मंडल का अंतिम निर्णय है।
मैम, एक स्थानीय महाविद्यालय में हिन्दी की अध्यक्षता हैं। और प्रेमचंद- साहित्य पर उन्होंने पी-एच.डी. किया है। वह साधिकार मुझ पर दबाव दे रही थीं, क्योंकि मैंने उन्हीं के महाविद्यालय से हिन्दी विषय में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। हालांकि उनसे जो कुछ सीखने-समझने का मुझे अवसर मिला, उसे भूला देना ही मेरे लिए श्रेयस्कर सिद्ध हुआ। संयोग से उस समय भी स्नातक तृतीय खंड में हमें 'कफन' कहानी पढ़ना था। मैम, बतौर प्रेमचंद-साहित्य की विशेषज्ञा आयी थी कहानी पढ़ाने। करीब डेढ़ घंटे का व्याख्यान हुआ था। उस शानदार व्याख्यान में घीसू और माधव की जो बेइज्जती हुई। ऐसी बेइज्जती भगवान् किसी का न कराये। अंततः घीसू और माधव को उन्होंने नम्बरी बदमाश, कामचोर और पेटू सिद्ध कर दिया। सच में अगर वे दोनों होते तो अबकी बुधिया के कफन के नाम पर फिर से पैसे मांग कर जहर पी लेते। आखिरकार बाप और बेटे की जान बची! मैम पूर्व की भाँति आज भी व्याख्यान के उत्तरार्द्ध में अपने चरित्र- चित्रण पर आ गयी। उन्होंने बताया कि कैसे वह प्रेमचंद- साहित्य पर शोध-कार्य करने का खतरा मोल ली थी। जब हिन्दी-विभागाध्यक्ष ने चुनौती दी कि आप में से कौन प्रेमचंद के जीवन और साहित्य पर शोध-कार्य कर सकता है? वर्ग में कुछ पैंतीस छात्र-छात्राएँ थे। सब अबाक्! सबने हाथ खड़े कर लिए। कथा- सम्राट् प्रेमचंद को सबने पढ़ा था, पर इस गंभीर विषय पर शोध? बाप रे! ये खतरा कौन मोल लेगा? जिनकी रचनाओं में संपूर्ण उत्तर भारत का सामाजिक- आर्थिक- राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास संचित है। कोई नहीं...... कोई नहीं। तब उनके विश्वास पर खड़ी उतरी थी- शारदा।
बाद में तो उनके परीक्षक को कहना पड़ा कि प्रेमचंद-साहित्य पर ऐसा मौलिक शोध-कार्य देश में पहली बार हुआ है। इसका शीघ्र प्रकाशन करवाया जाय, ताकि हिन्दी पाठकों को एक नयी दृष्टि मिल सके।
मैम के वर्ग भले ही हम लोगों ने हिन्दी विषय में कुछ न सीखा हो, पर सच बताऊं तो वर्ग का कमजोर विद्यार्थी भी उन पर एक शानदार जीवन-चरितात्मक उपन्यास लिख सकता है। उनके परिवार में कौन-कौन हैं? पति महोदय क्या करते हैं? बेटियाँ पढ़ाई में कैसी हैं? दामाद कितने बड़े-बड़े आदमी हैं? उनकी ख्याति, बेटे का अमेरिका प्रवास, उनकी सैलेरी, वहाँ का रहन-सहन, वहाँ की प्रकृति, मैम का खानदानी संस्कार, उनके परोपकार के कारनामे........शायद ही कभी भूल सकेगा कोई!
अंततः मैंने उनके शोध-आलेख को अपनी पत्रिका में स्थान देने से साफ मना कर दिया। यह अलग बात है कि तब गुस्से में वह मेरी और मेरी पत्रिका की औकात बताती हुई चली गयी।
कुछ दिनों के बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि हिन्दी-प्राध्यापिका, प्रेमचंद-साहित्य की विशेषज्ञा डाॅ. शारदा को मिलेगा वर्ष- 2019 का 'शिक्षक श्री' सम्मान। यह सम्मान उन्हें 'शिक्षक-दिवस' के अवसर पर दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति महोदय के हाथों प्रदान किया जाएगा। इस विषय को लेकर हिन्दी प्राध्यापको में खुशी का लहर है।साथ ही विश्वविद्यालय- परिवार ने भी उनके लिए एक स्वागत-समारोह की तैयारी शुरू कर दी है।
इधर फेसबुक और वाट्सप पर बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था। मैं सोचता रह गया अपने उन महान शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने बिना किसी सम्मान की चाहत के शिक्षा के नाम पर अपना जीतन समर्पित कर दिया। मैं सोचता रहा 'शिक्षक श्री' सम्मान हेतु चयन के आधार के विषय में, पर अब तक किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सका हूँ।
प्रिय पाठकों! आपको पता हो तो मेरे निजी संपर्क -संख्या 6201464897 पर जरूर बताना मुझे।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
उस दिन शारदा मैम से मेरी फिर ठन गयी। वह लगातार राग अलापे जा रही थी कि मेरा शोध-आलेख जिस रूप में है, उसी रूप में छापिये उसे। आपने जैसा कहा, उसके अनुरूप सुधार कर दिया गया है।
मैं अपनी जिद्द पर अड़ा था कि 'कफन कहानी का पुनर्पाठ' जैसे घिसे-पिटे विषयों पर आलेख छापकर हम अपनी पत्रिका का स्तर नहीं गिरा सकते। माफ कीजिए मैम। इस प्रकार का आग्रह नहीं कीजिए, हम मजबूर हैं। यह संपादक-मंडल का अंतिम निर्णय है।
मैम, एक स्थानीय महाविद्यालय में हिन्दी की अध्यक्षता हैं। और प्रेमचंद- साहित्य पर उन्होंने पी-एच.डी. किया है। वह साधिकार मुझ पर दबाव दे रही थीं, क्योंकि मैंने उन्हीं के महाविद्यालय से हिन्दी विषय में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। हालांकि उनसे जो कुछ सीखने-समझने का मुझे अवसर मिला, उसे भूला देना ही मेरे लिए श्रेयस्कर सिद्ध हुआ। संयोग से उस समय भी स्नातक तृतीय खंड में हमें 'कफन' कहानी पढ़ना था। मैम, बतौर प्रेमचंद-साहित्य की विशेषज्ञा आयी थी कहानी पढ़ाने। करीब डेढ़ घंटे का व्याख्यान हुआ था। उस शानदार व्याख्यान में घीसू और माधव की जो बेइज्जती हुई। ऐसी बेइज्जती भगवान् किसी का न कराये। अंततः घीसू और माधव को उन्होंने नम्बरी बदमाश, कामचोर और पेटू सिद्ध कर दिया। सच में अगर वे दोनों होते तो अबकी बुधिया के कफन के नाम पर फिर से पैसे मांग कर जहर पी लेते। आखिरकार बाप और बेटे की जान बची! मैम पूर्व की भाँति आज भी व्याख्यान के उत्तरार्द्ध में अपने चरित्र- चित्रण पर आ गयी। उन्होंने बताया कि कैसे वह प्रेमचंद- साहित्य पर शोध-कार्य करने का खतरा मोल ली थी। जब हिन्दी-विभागाध्यक्ष ने चुनौती दी कि आप में से कौन प्रेमचंद के जीवन और साहित्य पर शोध-कार्य कर सकता है? वर्ग में कुछ पैंतीस छात्र-छात्राएँ थे। सब अबाक्! सबने हाथ खड़े कर लिए। कथा- सम्राट् प्रेमचंद को सबने पढ़ा था, पर इस गंभीर विषय पर शोध? बाप रे! ये खतरा कौन मोल लेगा? जिनकी रचनाओं में संपूर्ण उत्तर भारत का सामाजिक- आर्थिक- राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास संचित है। कोई नहीं...... कोई नहीं। तब उनके विश्वास पर खड़ी उतरी थी- शारदा।
बाद में तो उनके परीक्षक को कहना पड़ा कि प्रेमचंद-साहित्य पर ऐसा मौलिक शोध-कार्य देश में पहली बार हुआ है। इसका शीघ्र प्रकाशन करवाया जाय, ताकि हिन्दी पाठकों को एक नयी दृष्टि मिल सके।
मैम के वर्ग भले ही हम लोगों ने हिन्दी विषय में कुछ न सीखा हो, पर सच बताऊं तो वर्ग का कमजोर विद्यार्थी भी उन पर एक शानदार जीवन-चरितात्मक उपन्यास लिख सकता है। उनके परिवार में कौन-कौन हैं? पति महोदय क्या करते हैं? बेटियाँ पढ़ाई में कैसी हैं? दामाद कितने बड़े-बड़े आदमी हैं? उनकी ख्याति, बेटे का अमेरिका प्रवास, उनकी सैलेरी, वहाँ का रहन-सहन, वहाँ की प्रकृति, मैम का खानदानी संस्कार, उनके परोपकार के कारनामे........शायद ही कभी भूल सकेगा कोई!
अंततः मैंने उनके शोध-आलेख को अपनी पत्रिका में स्थान देने से साफ मना कर दिया। यह अलग बात है कि तब गुस्से में वह मेरी और मेरी पत्रिका की औकात बताती हुई चली गयी।
कुछ दिनों के बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि हिन्दी-प्राध्यापिका, प्रेमचंद-साहित्य की विशेषज्ञा डाॅ. शारदा को मिलेगा वर्ष- 2019 का 'शिक्षक श्री' सम्मान। यह सम्मान उन्हें 'शिक्षक-दिवस' के अवसर पर दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति महोदय के हाथों प्रदान किया जाएगा। इस विषय को लेकर हिन्दी प्राध्यापको में खुशी का लहर है।साथ ही विश्वविद्यालय- परिवार ने भी उनके लिए एक स्वागत-समारोह की तैयारी शुरू कर दी है।
इधर फेसबुक और वाट्सप पर बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था। मैं सोचता रह गया अपने उन महान शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने बिना किसी सम्मान की चाहत के शिक्षा के नाम पर अपना जीतन समर्पित कर दिया। मैं सोचता रहा 'शिक्षक श्री' सम्मान हेतु चयन के आधार के विषय में, पर अब तक किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सका हूँ।
प्रिय पाठकों! आपको पता हो तो मेरे निजी संपर्क -संख्या 6201464897 पर जरूर बताना मुझे।
डॉ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
सहरसा, बिहार
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