मैं, बुद्ध नहीं बन सकता
या कहूँ कि कोई भी नहीं बन सकता बुद्ध
चूँकि अब रोज बदल जाते हैं
सत्य के मायने।
अहिंसा की परिभाषा भी
बदल दी जाती है रोज-रोज,
देश, काल और परिस्थिति के मुताबिक।
अब अस्तेय बेमतलब की चीज़ है,
अपरिग्रह दिखावा है बस
और ब्रह्मचर्य एक जाल है,
स्त्री को सहजता से फँसाने का।
आज अगर सत्य खोजने सिद्धार्थ
निकल भी जाता घर से
यशोधरा को छोड़कर
तो वह उसे पकड़ लाती
चूँकि उसे पता है कि अब
बुद्ध होने का कोई अर्थ नहीं है।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
या कहूँ कि कोई भी नहीं बन सकता बुद्ध
चूँकि अब रोज बदल जाते हैं
सत्य के मायने।
अहिंसा की परिभाषा भी
बदल दी जाती है रोज-रोज,
देश, काल और परिस्थिति के मुताबिक।
अब अस्तेय बेमतलब की चीज़ है,
अपरिग्रह दिखावा है बस
और ब्रह्मचर्य एक जाल है,
स्त्री को सहजता से फँसाने का।
आज अगर सत्य खोजने सिद्धार्थ
निकल भी जाता घर से
यशोधरा को छोड़कर
तो वह उसे पकड़ लाती
चूँकि उसे पता है कि अब
बुद्ध होने का कोई अर्थ नहीं है।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
0 Comments:
Post a Comment