जिसे याद करती है दुनिया
वह बस याद बनकर रह गयी
उन्हीं यादों के सहारे
चलता रहा हूँ मैं जीवन पथ पर
गिरता-पड़ता, ठोकर खाता।
वह कहती थी अक्सर कि
मुश्किल नहीं है कोई भी काम
लड़ना अगर नियति बन जाए
जीवन का, और अभाव शक्ति
उनके इसी विश्वास को थामे
चलता रहा हूँ मैं अबतक,
गिरता-पड़ता-लड़ता, अनथक
कि झूठ नहीं बोल सकती 'माँ'।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
वह बस याद बनकर रह गयी
उन्हीं यादों के सहारे
चलता रहा हूँ मैं जीवन पथ पर
गिरता-पड़ता, ठोकर खाता।
वह कहती थी अक्सर कि
मुश्किल नहीं है कोई भी काम
लड़ना अगर नियति बन जाए
जीवन का, और अभाव शक्ति
उनके इसी विश्वास को थामे
चलता रहा हूँ मैं अबतक,
गिरता-पड़ता-लड़ता, अनथक
कि झूठ नहीं बोल सकती 'माँ'।
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
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