वे चले थे चुपचाप
वहीं के लिए जत्था बनाकर,
जहाँ से आये थे छोड़कर
अपने भूखे बच्चे को
अपनी निरीह पत्नी को
अपनी बीमार माँ को
अपने बूढ़े बाप को
अपने तिनकठवा खेत को
अपनी दुग्धहीन गाय को
अपने समाज को
अपनी भाषा को
अपनी संस्कृति और संस्कार को
ताकि मिल सके रोटी उन्हें
दो वक्त की।
पर उसी के गलाये लोहे पर
पीस दिया उसे बेरहमी से
उसी के गलाये लोहे ने।
मुझे पता है कि
इस पर भी होगी राजनीति
इस साजिश को एक
इत्तेफाकी घटना का नाम दिया जाएगा।
(8 मई, 2020 को 16 मजदूरों के ट्रेन से कुचलने के संदर्भ में)
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
संपर्क- 6201464897
वहीं के लिए जत्था बनाकर,
जहाँ से आये थे छोड़कर
अपने भूखे बच्चे को
अपनी निरीह पत्नी को
अपनी बीमार माँ को
अपने बूढ़े बाप को
अपने तिनकठवा खेत को
अपनी दुग्धहीन गाय को
अपने समाज को
अपनी भाषा को
अपनी संस्कृति और संस्कार को
ताकि मिल सके रोटी उन्हें
दो वक्त की।
पर उसी के गलाये लोहे पर
पीस दिया उसे बेरहमी से
उसी के गलाये लोहे ने।
मुझे पता है कि
इस पर भी होगी राजनीति
इस साजिश को एक
इत्तेफाकी घटना का नाम दिया जाएगा।
(8 मई, 2020 को 16 मजदूरों के ट्रेन से कुचलने के संदर्भ में)
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर
संपर्क- 6201464897
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