कबीर-चिंतन की प्रासंगिकता

              दलित-पीड़ित-शोषित और वंचित जन के महानायक, महान् वक्ता, श्रेष्ठ चिंतक , समाज -सुधारक, धर्म -परिष्कारक तथा कुशल कवि के रूप में कबीर का चिंतन विगत छह सौ वर्षों से अबतक अक्षय प्रकाश पुंज की भाँति आलोक बिखेरते आ रहे हैं। भाषा और साहित्य की शास्त्रीय या आभिजात्य परंपरा के खिलाफ़ विद्रोह करने वाले कवि के रूप में उनकी ख्याति आज भी अक्षुण्ण है। कबीर ने जहाँ एक ओर संस्कृत को कूप जल कहकर नकारा और जनभाषा में सृजन कर सरस्वती का अभिषेक किया, वहीं पंडितों शास्त्रीय परंपरा के विरूद्घ आँखन देखी को ही सृजन का आधार बनाया। वे तो जातीय विषमता और पंडितों की वर्णगत श्रेष्ठता के खिलाफ मुहिम चला ही रहे थे, साथ ही हिन्दुओं और मुसलमानों को उसके धार्मिक आडंबर के लिए डाँट भी लगा रहे थे। कबीरदास ने यज्ञ, उपनयन, पूजा- पाठ और पशु -बलि जैसे कर्मकांडों का निषेध किया है। उन्होंने ईश्वर और अल्लाह के भेद को मिटाते हुए मंदिर और मस्जिद के बजाय उन्हें अपने भीतर खोजने की बात कही है।
            कबीर के चिंतन में तमाम भारतीय धर्मों का उत्तमांश संयोजित हैं। आज के दौर में जब जाति और धर्म के नाम पर मार-काट जारी है। गौ-रक्षा और राम-मंदिर के नाम पर उग्र हिन्दुत्व और जिहाद के नाम पर उग्र इस्लामत्व की टकराहट से मानवता तार-तार हो रही है, समाज में हिंसावृति का चरम रूप दिखाई पड़ रहा है, तब कबीरदास का चिंतन और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है। हम कबीर के संदेश को अपने जीवन में उतार कर श्रेष्ठ और परिष्कृत समाज का निर्माण कर सकते हैं।
             अतएव, कबीर के चिंतन के विविध आयाम हमारे वैचारिक संवर्धन और परिवर्धन के लिए उपयोगी है, सार्थक है और अनुकरणीय है।
     
 डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार एवं ब्लाॅगर

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