नई पीढ़ी पर स्मृति-लोप का संकट
- डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
चार्ल्स डार्विन ने ठीक ही कहा था कि 'प्राणी जिस अंग का उपयोग सबसे अधिक करेगा, वह अंग अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय और मजबूत बनेगा। साथ ही जिस अंग का उपयोग नहीं करेगा, धीरे- धीरे उसका लोप हो जाएगा। समय के साथ आदमियों ने पूंछ का उपयोग बंद कर दिया, तो पूंछ झड़ गये। ज्ञान- विज्ञान के आविष्कारों ने मानव जीवन को सहज बना दिया। शारीरिक श्रम के स्थान पर बौद्धिक श्रम ने ले लिया। परिणामस्वरूप मानव, शरीर से बौने और दुर्बल तथा मस्तिष्क से मजबूत होने लगा। वैज्ञानिक शोधों ने सिद्ध कर दिया है कि मानव मस्तिष्क के आकार में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। दुनिया में हजारों तरह के अन्वेषण हुए, यह सब मानव मस्तिष्क की ऊपज है। लेकिन अब हम 'कृत्रिम बुद्धिमता' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के दौर में आ गये हैं, मानव शरीर के समान ही मानव मस्तिष्क भी निष्क्रिय होता जा रहा है। मनुष्य अपने मस्तिष्क के स्थान पर कृत्रिम बुद्धिमता का उपयोग करने लगा है। अब न उसे कुछ याद रखने की जरूरत है न कुछ क्रिएशन करने की। एआई पलक झपकते ही उसका काम कर देता है। एआई कविता लिख सकता है, कहानी लिख सकता है, मनपसंद पेंटिंग बना सकता है, करोड़ों का हिसाब सेकेंड में निपटा सकता है, तो फिर मानव मस्तिष्क का निष्क्रिय होना लाज़मी है। अगर सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो कालांतर में पूंछ की भाँति मनुष्य का मस्तिष्क भी नष्ट हो जाएगा।
संस्कृत में एक उक्ति प्रचलित है- 'अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापते। यथास्वमेव रोच्यते विश्वं तथैदन परिवर्तते।' अर्थात् इस अपार संसार में कवि ब्रह्मा के समान हैं, उन्हें यह संसार जैसा प्रतीत होता है, वैसा ही रच देता है।' पाश्चात्य विद्वान विलियम वर्ड्सवर्थ ने कहा है- 'कवि दृश्य जगत के समानान्तर अपने भीतर एक आभासी संसार का निर्माण करता है, काव्य उसी संसार का प्रतिरूपण है।' कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा की रचना के इतर जो भी चीजें इस सृष्टि में दिख रही हैं, वह मानव मस्तिष्क की निर्मिति है। आज तक जितने आविष्कार हुए, जितने काव्यों, महाकाव्यों का सृजन हुआ या दर्शनों एवं धर्मों का निर्माण हुआ, वह मानव के अंतर्मन में घटित हुआ। इस संदर्भ में अरस्तू ने कल्पना सिद्धांत में सिद्ध किया है कि 'दृश्य जगत का मूल आधार 'प्रत्यय जगत' (विचार जगत) है।' सर्वप्रथम मन में विचार आता है, तदनुरूप वस्तु या कला का निर्माण किया जाता है। परमात्मा ने सर्वप्रथम अपने मन में दृश्य संसार की कल्पना की होगी। सृष्टि की रूप रेखा पर मन ही मन विचार किया होगा, तत्पश्चात सृष्टि का निर्माण किया होगा। अतएव सृजन बाह्य नहीं, आंतरिक अभिव्यक्ति है।
भारतीय वेदांत भी सिद्ध करता है कि कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता है, बाहरी घटनाएँ केवल उत्प्रेरक का काम करती हैं। ज्ञान का आलोक मानव के भीतर से प्रस्फुटित होता है। पाश्चात्य विद्वान क्रोचे ने कला को मानव की अंत:प्रज्ञा से जोड़ा है। लेकिन वर्तमान समय में बाह्य परिस्थिति ने मानव के अंतस में इतना शोर पैदा कर दिया है कि वह अपने भीतर की आवाज सुन ही नहीं पाता। हमारी वर्तमान पीढ़ी का चित्त इतना अस्थिर है कि उसमें कुछ ठहरता ही नहीं।
भारतीय ज्ञान-परंपरा पर विचार करें तो संपूर्ण भारतीय वांग्मय को रटंत- परंपरा ने न केवल हजारों वर्षों तक जीवित रखा है, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को यथारूप हस्तांतरित किया। उस समय के गुरु और शिष्य की स्मृति कितनी प्रखर थी कि उन्होंने मौखिक परंपरा में ज्ञान को अनंत काल तक संरक्षित रखा। साथ ही बिना किसी लिखित संदर्भ के अपने शिष्यों को चारों वेदों, उपनिषदों और आरण्यकों की गंभीर ज्ञान दिया। उस समय के विद्यार्थियों की स्मृति कैसी होगी, जब उन्होंने सुनकर ही संपूर्ण ज्ञान को अपने में आत्मसात कर लिया होगा। तभी तो भारतवर्ष को विश्वगुरु की उपाधि मिली होगी थी। आज कहां चले गये वैसे गुरु और किस अंधेरे में खो गये शिष्य। आज के गुरुजी को वर्ग-संचालन के लिए किताबें चाहिये.....नोट्स चाहिए.....बना बनाया पीपीटी चाहिए। और विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए कंप्लीट नोट्स चाहिए। गंभीर ज्ञान उसके लिए बोरिंग विषय है और पाठ में निर्धारित मूल टेक्स्ट पकाऊ!
उच्च शिक्षा में जो गुणवत्ता का ह्रास हुआ है, इसके लिए शिक्षार्थी के साथ-साथ शिक्षक भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर कक्षाओं में अअध्यापन करने वाले एक प्रोफेसर साहब को मैंने देखा कि वे अचानक वर्ग में जाने से मना कर दिया। कारण बस इतना था कि वे आज घर पर ही अपनी डायरी भूल आए थे। मैं पूछता हूँ कि जिन प्रोफेसरों को ज्ञान का क्रिएटर कहा जाता है, वे क्यों उधार की चीजों से अपना काम चला रहे हैं। आखिरकार उधार के ज्ञान से वे किस परंपरा का निर्माण कर रहे हैं। जिन्हें नवाचार के लिए वेतन के रूप में मोटी रकम दी जाती है, वे अपना कर्तव्य क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। मुझे लगता है स्कूल शिक्षकों की भांति ही महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के अधिकांश प्राध्यापकगण भी या तो अरुचि से या लालचवश इस पेशे में आ गये हैं। उनके लिए अध्यापन एक जिम्मेदारी नहीं, लाभ का धंधा है। मैं जानता हूँ कि जो कुछ और नहीं बन सके, उनमें से अधिक लोग शिक्षक बन गये हैं। ऐसे शिक्षकगण भारत को विश्वगुरु बना देंगे, ऐसी कल्पना भी व्यर्थ है।
कृत्रिम बुद्धिमता ने सबसे अधिक प्रहार मानव- स्मृति पर किया है। मोबाईल संस्कृति ने दुनियाभर में एक किस्म का पागलपन फैलाया है। यह न केवल सोशल डिस्टेंस पैदा किया है, न केवल मानवीय संवेदनाओं को कुंद किया है, वरन् मानव की स्मृति का नाश किया है। एक ओर कम्प्यूटर पलक झपकते ही करोड़ों का हिसाब कर देता है, बल्कि समस्त सूचनाओं को भी संचित रखता है। एआई ने तो और भी कमाल कर दिया। वह पल भर में प्रश्न का उत्तर तैयार कर देता है, कविता, कहानी और आलोचना लिख देता है। पेंटिंग बना देता है, फिर मानव मस्तिष्क का निरर्थक हो जाना स्वाभाविक ही है। वर्तमान पीढ़ी के अधिकांश विद्यार्थी एआई की मदद से परीक्षोपयोगी नोट्स बना रहे हैं। कट-काॅपी-पेस्ट की कला में वे पारंगत हैं। गुणवत्तापूर्ण अन्वेषण करने का धैर्य उनमें नहीं है। विडम्बना है कि जो ठीक से एक आवेदन नहीं लिख सकते, वे एआई की मदद से मोटी- मोटी किताबें लिख रहे हैं। आख़िरकार हमारा भविष्य कैसा होगा, जब नकलची पीढ़ी के हाथों में हमारा राष्ट्र होगा! विद्यार्थियों में गंभीर अध्ययन के प्रति अरुचि भाव इसी तरह दिनानुदिन बढता रहा तो भारतीय ज्ञान-परंपरा का क्या होगा? कौन इस विरासत का उत्तराधिकारी होगा? कौन उसे संरक्षित करेगा? कौन आगे बढ़ाएगा...? यह चिंतनीय है।
एतदर्थ, स्मृति-लोप के संकट से जूझने वाली पीढ़ी को सोचना होगा कि 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' कभी भी 'रियल इंटेलिजेंस' को टक्कर नहीं दे सकता। उन्हें जानना होगा कि मस्तिष्क के रूप में हमारे पास सुपर कम्प्यूटर है, बस उसके की बोर्ड का पता करना है। उन्हें विचारना होगा कि एआई भी मानव मस्तिष्क की निर्मिति है। उसे अपना सहयोगी बनाना चाहिए, मालिक नहीं। एआई के सहयोग से हम कविता, कहानी, उपन्यास जरूर लिख सकते हैं, पर तुलसी जैसा 'रामचरित मानस' नहीं रच सकते। टैगोर की तरह 'गीतांजलि' नहीं लिख सकते। टॉलस्टॉय की भाँति 'वार एंड पीस' या प्रेमचंद की तरह 'गोदान' नहीं लिख सकते! एआई कभी भी मानवीय संवेदना के उत्कर्ष तक नहीं पहुंच सकता। इसलिए देश की वर्तमान पीढ़ी को अपनी स्मृति को संरक्षित करना चाहिए, उसे प्रखर बनाना चाहिए।
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लेखक, श्री राधा कृष्ण गोयनका महाविद्यालय, सीतामढ़ी (बिहार) के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक और अध्यक्ष हैं।
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