प्रेमचंद की कहानियों में बाल- विमर्श
कथा-सम्राट प्रेमचंद ने भारतीय जीवन के तमाम संदर्भों को अपनी कहानियों और उपन्यासों में समेटा है। जिस वक्त साहित्य में विमर्शों में चर्चा भी नहीं हुई थी। उस समय उन्होंने अपने कथा-साहित्य के बहाने अनेक विमर्शों की नींव रखीं। दलित- विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, कृषक-विमर्श, वृद्ध-विमर्श, बाल-विमर्श, प्रकृति- विमर्श के साथ ही भाषा- विमर्श और राष्ट्र-विमर्श उनके साहित्य में स्पष्ट देखे जा सकते हैं। प्रेमचन्द ने जीवन के तमाम अनछुए पहलुओं को अपने सृजन का विषय बनाया। बाल विमर्श की बात करें तो बच्चों पर उन्होंने अनेक कहानियाँ लिखीं। बानगी के तौर पर 'ईदगाह', 'दो बैलों की कथा' तथा 'कुत्ते की कहानी' का अवलोकन किया जा सकता है। 'ईदगाह' एक मनोवैज्ञानिक कहानी है, जिसमें रचनाकार ने बाल मनोविज्ञान का सफल प्रयोग किया है। कहानी का नायक हामिद है। अनाथ हामिद! दादी ही उसका एकमात्र सहारा है। ईदगाह के अवसर पर गांव के अन्य बच्चों के साथ हामिद भी मेला घूमने जाता है। मेले में सभी बच्चे मिठाइयां खरीदकर खाते हैं और हामिद को तरसाते हैं। वे तरह- तरह के खिलौने खरीदते हैं, पर हामिद क्या करे! उसके पास तो बस तीन आने पैसे हैं। वह बहुत सोच- विचार कर अंतत: दादी के लिए लोहे का चिमटा खरीदता है। बच्चे उसे बेवकूफ समझते हैं। ताने मारते हैं, खिल्ली उड़ाते हैं, व्यंग्य करते हैं, परंतु हामिद अपने तर्क से सबको पछाड़ देता है। वह कहता है कि मेरा चिमटा बहादुर है, वह आग में कूद सकता है। यहां चिमटे के पक्ष में हामिद के द्वारा पेश किया गया तर्क उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण दादी का हमदर्द होना है। दादी के प्रति हृदय से संवेदनशील होना है। वर्तमान समय में जब मनुष्य की संवेदना कुंद हो गई है, यह कहानी और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। आज जब हमारे समाज वर्तमान पीढ़ी के बच्चे 'जेनरेशन गैप' के शिकार हो गये हैं। दादी और नानी से उनका संबंध- विच्छेद हो गया है! यह पीढ़ी इतना फास्ट है कि दादी और नानी ही नहीं, इसके लिए माता- पिता भी 'आउटडेटेड' हो गये हैं। ऐसी स्थिति दादी के प्रति हामिद की संवेदनशीलता बच्चों की मृतप्राय चेतना पर प्रहार करती है।
प्रेमचंद ने बच्चों के लिए 'दो बैलों की कथा' लिखी। ये झूरी के दो बैल हैं। पर यह केवल बैलों की कहानी नहीं है, वरन बैलों के बहाने स्वाधीनता की खोज है। झूरी के दोनों बैलों को उसके एक नातेदार ले जाते हैं अपनी खेती के लिए, लेकिन वहाँ इन बैलों, अर्थात हीरा और मोती का शोषण होता है। उसे न समय से सानी मिलता है न पानी। ऊपर से उनसे सुबह से शाम तक काम लिया जाता है, जिससे बैलों की हालत पस्त हो जाती है। ये बैल सही मायने में अंग्रेजों से शोषण से हिम्मतपस्त भारत की आम आदमी का प्रतीक है। आखिरकार एक दिन ये बैल अपनी रस्सियों को तोड़कर अपने मालिक झूरी के खूटे पर आ जाते हैं। यह कहानी बच्चों के भीतर स्वाधीनता का भाव जगाती है। उन्हें अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़ना सिखाती है।
ठीक इसी तरह 'कुत्ते की कहानी' भी केवल कुत्ते की कहानी नहीं है। यहाँ भी प्रेमचंद बालमन में स्वाधीनता की चेतना भरते हैं। यह कहानी मूल रूप से एक कुतिया की कोख से उत्पन्न दो पिल्लों की कहानी है। कहानी में भाग्यवश एक पिल्ले को एक अमीर आदमी उठाकर ले जाता है और पालता है, लेकिन दूसरा पिल्ला मजबूरन सड़क छाप कुत्ता बन जाता है। न खाने का ठिकाना, न रहने का। दिनभर भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकना उनकी नियति हो गई है। इसके विपरीत दूसरा भाई दूध- भात खाता है और मुलायम गद्दे पर सोता है। रोज सुबह उसे एक नौकर घुमाने ले जाता है। अपने भाई की फटेहाली पर उसे तरस आता है! एक ही मां के गर्भ से दोनों पैदा हुए, पर नसीब अपना- अपना! एक दिन उस कुत्ते ने भाई की दुरवस्था से आहत होकर कहा कि 'भाई तुम भी मेरे साथ चलोगे तो, तुम्हें भी अच्छा खानी- पानी मिलेगा और सोने के नर्म बिस्तर।'
लेकिन सड़क छाप कुत्ते ने जो जवाब दिया, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसने कहा कि भाई ये सब तो ठीक है, लेकिन मुझे तुम्हारे गले का पट्टा पसंद नहीं है। मैं भूखा हूँ तो हूँ, पर आजाद हूँ। कोई मेरा मालिक नहीं है। जहाँ चाहता हूँ, वहाँ घूमता हूँ। कोई बंधन पसंद नहीं है मुझे। कुत्ते की यह अभिव्यक्ति बच्चों के मानस में स्वाधीनता का चेतना भर देता है। वह सुखोपभोग से अधिक स्वाधीनता को महत्व देता है।
एतदर्थ, प्रेमचंद की कहानियों में बाल- विमर्श उत्कृष्ट रूप में मिलता है। उनका बाल-साहित्य बच्चों के मनोरंजन के निमित्त नहीं है। वह गुलाम भारत के नौनिहालों के अन्तर्मन में स्वाधीनता की चेतना को भरने की चेष्टा करते हैं। अतएव प्रेमचंद की कहानियां 'वेवजाल' से चौतरफा घिरे हुए बच्चों के लिए आपातकालीन खिड़की की भाँति है, वह चाहे तो वहाँ से छलांग मारकर अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकते हैं।
- डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
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