कहानी :
राॅन्ग नंबर
एक अनजान नंबर से तीसरी बार काॅल आया -"मैं नेहा बोल रही हूँ....नेहा पाठक।"
"नेहा पाठक....! लेकिन मैं किसी नेहा पाठक को नहीं जानता! प्लीज! बार- बार काॅल करके परेशान न करें। राॅन्ग नंबर है।"
"अरे यार मैं, नेहा हूँ....आपकी सहपाठिन। आपके साथ ही एम..ए. पास हूँ मैं भी.....!" उनकी आवाज में कुछ तल्खी थी," बड़े लोग हो जाने के बाद छोटे लोगों को भूल ही गये!"
"ओ साॅरी! मुझे लगा कोई राॅन्ग नंबर....."
"आप राॅन्ग नंबर की बात करते हो। मेरी जिंदगी ही राॅन्ग नंबर डायल हो गयी है!" उनकी आवाज में कुछ अपनापन था और कुछ उपालंभ भी।
"मेरे साथ तो नेहा झा पढ़ाई करती थी...... तो तुम नेहा पाठक हो गई अब! बताओ और सब..... कैसी हो? इतने सालों बाद कैसे याद आए हम.... तुमने तो अपना नाम और नंबर सब बदल लिया....!"
वह कुछ देर के लिए मौन हो गई। "मैंने कुछ नहीं बदला....समय ने बदल दिया! शादी के बाद वे नहीं चाहते थे कि मैं किसी से संपर्क रखूं। उन्होंने मेरा मोबाईल बदल दिया। उसमें नया नंबर चालू करवाया, जिसमें उनके ही परिवार के लोगों का नंबर सेव था। मैं अपने मां- बांप और भाई के सिवा किसी से बात नहीं कर सकती थी।..... बड़ी मुश्किल से आपका नंबर उपलब्ध हो पाया है। मुझे कोई काम मिलेगा क्या...?"
"काम....तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई हो पाई या.......!" मैंने पूछा उनसे।
"कुछ नहीं....कमला नदी में बहा दिया मैंने अपनी सारी किताबें! चूल्हे की आग में भष्म कर दिये अपने सपने.....!" वह फफककर रो पड़ी।
"कौन- सा काम करेगी!" मैंने उन्हें सहज करते हुए पूछा,"लेकिन तुम्हें काम की क्यों जरूरत पड़ गई। पति तो नौकरी में हैं न!"
"पति की कमाई पर जी सकती हूँ बस....अपनी जरूरतों के लिए रोज- रोज हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता। मेरे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ गई है। अब और नहीं.....!" वह फिर रोने लगी।
नेहा मेरी सहपाठिन थी। बेहद हसीन लड़की। दुनिया की तमाम चिंताओं से मुक्त होकर जीने वाली। उनके भी सपने मेरे ही तरह बड़े थे। एम. ए. करने के बाद नेट/जे. आर. एफ. की तैयारी करनी है.....पी-एच.डी. करना है..... प्रोफेसर बनना है। उन्हें भी मेरी ही तरह स्कूल की मास्टरी पसंद नहीं था। वह कहती कि यह भी कोई नौकरी है यार...चार टांग की कुर्सी पर एक ही जगह बैठे- बैठे रिटायर। न कोई प्रमोशन न कोई परिवर्तन। बच्चों के साथ रहते-रहते बच्चों जैसा स्वभाव....बच्चों - सी तनुकमिजाजी। संयोग से नेहा के पिता भी स्कूल के मास्टर थे। इसीलिए मास्टर को उन्होंने बहुत करीब से देखा था। मास्टरी से उन्हें चिढ़ हो गयी थी।
नेहा वर्ग की अन्य लड़कियों से बिल्कुल अलग थी। उन्हें किसी भी बात पर खुलकर हंसना बहुत पसंद था। वह वर्ग के दौरान भी हंसने में कोई कोताही नहीं करती। इस कारण वह न केवल अपने वर्ग शिक्षकों से डांट खाती थी, बल्कि अन्य विषय के शिक्षक भी वर्ग के बीच में आकर उन्हें डांटने थे। यूं कहें कि नेहा हंसने के लिए बदनाम थी।
जिस तरह मुर्दहिया की नटिनियां किसी भी ध्वनि पर नाचने लगती थी। कोई गीत गाए....कहीं दूर से कोई धुन सुनाई दे, कोई गाय रंभाएं या कोई चरवाहा लक्कर ध्वनि बजाए। नटिनियां जहाँ होती, वहीं नाचना शुरु कर देती थी। उसी तरह नेहा किसी भी बात पर गुदगुदा जाती थी। जैसे किसी ने कहा कि मैंने कल चार समोसे खाए.....बस वह लगाती ठहाका.....जैसे कोई शिक्षक पद्मावत को पढ़ाने के दौरान कहता कि 'राजा रत्नसेन अपनी पत्नी नागमती को छोड़कर पद्मावती की खोज में निकल पड़ा....!' बस इतना सुनना था कि नेहा लगाती ठहाका। एक बार तो मैंने उसे स्वयं फिसलकर गिरने के बाद हंसते हुए देखा था। पता नहीं इतनी मस्ती वह कहां से लाती थी। न अतीत से कोई शिकायत, न भविष्य की चिंता। वह अपने वर्तमान को पूर्णता के साथ जी रही थी।
इसी तरह कैसे दो साल गुजर गये, पता भी न चला। अंतिम परीक्षा के लिए हम सभी ने अपना फार्म डाल दिया। सभी शिक्षक क्रमिक रूप से अपने- अपने अंतिम व्याख्यान देने लगे थे। और रोज वर्ग आने वाली नेहा चार दिनों से अनुपस्थित थी। उनके ठहाकों से गूंजने वाला वर्ग कितना सूना लग रहा था! अब शिक्षक लोग भी उनकी हंसी के आदी हो चुके थे। वे पूछने लगे कि नेहा क्यों नहीं आ रही है। उसके बिना वर्ग कितना शांत लगता है! जैसे वर्ग में कोई हो ही नहीं! दूसरे विभाग के शिक्षक आकर पूछते कि वह हंसने वाली लड़की आज क्यों नहीं आई!
उनकी अनुपस्थिति से हमलोग परेशान थे। नेहा को काॅल किया गया। उनका फोन लगातार बंद आ रहा था। हम सभी चिंतित थे कि उन्हें क्या हो गया? सप्ताह भर बाद नेहा आई वर्ग में एकदम शांत... सहज... उत्साहहीन.....वर्ग के सभी मित्रों ने उनका हालचाल पूछा। वह सबको एक ही जबाव देती कि ठीक हूँ मैं.....!"
"लेकिन तुम आज इतनी उदास क्यों हो.....! हंसती क्यों नहीं!" मैंने पूछा उनसे।
"लकड़यों को हंसना नहीं चाहिए.....यह ठीक नहीं है.....!" उस दिन इतना कहकर नेहा और उदास हो गई। सच में उस दिन के बाद किसी ने नेहा को हंसना क्या, मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा!
नेहा एम. ए. फाइनल की परीक्षा देने आई किसी अनजान आदमी के साथ, दोपहिया वाहन पर बैठकर। वह आदमी उनके परिवार के सदस्य नहीं थे। नेहा ने किसी से उनका परिचय भी नहीं कराया। वह अपने वर्ग मित्रो के प्रश्न से बचने के लिए परीक्षा में तब आती, जब कॉपियां बट चुकी होती थीं। और अंत में वह सबसे पहले काॅपी जमा करके निकल जाती। परीक्षा संपन्न हो गई। हमलोग नेट/ जे.आर.एफ. की तैयारी में जी जान से जुट गये। परंतु नेहा का किसी को कोई खोज- खबर नहीं था!
एक दिन अचानक नेहा का भाई आकर मुझे शादी का कार्ड दे गया। उनकी शादी बगल के ही गांव में एक मास्टर से होने जा रही थी। शादी में अनेक सहपाठी उपस्थित हुए....हंसने के लिए बदनाम वह लड़की दुल्हन बनी बैठी थी। सभी ने उन्हें शादी की बधाईयां दीं, पर वह प्रत्युत्तर में किसी का आभार व्यक्त नहीं कर पायी.....! वह एक अज्ञात मौन में डूबी थी। इतना जल्दी उनका कायान्तरण कैसे हो गया, किसी को पता नहीं!
"नेहा! शादी हो गयी तो क्या हो गया।" मैंने मौका पाकर इतना कहा, "शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखना......नेट का फार्म डाली हो न......?"
"नहीं.......उन्होंने मना कर दिया। वे कहते हैं कि पत्नी की कमाई पर पलने वाला मर्द नहीं हूँ मैं।" उनकी आँखें भर आई थीं।
मैं सोचता रहा कि जब किसी मर्द को अपनी सेवा के लिए एक नौकरानी ही चाहिए.....शरीर सुख के लिए एक स्त्री देह ही चाहिए तो...फिर उन्हें अच्छी पढी- लिखी पत्नी की दरकार क्यों! अपने अहं की तुष्टि के लिए किसी स्त्री के सपने को कुचल देना ही पौरूष है क्या!
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डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
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