कहानी :
"अगर मैं अपने आप को बचा नहीं पाई तो उस इसी पंखे से झूल जाउंगी! आप देख लेना!" उनका यह शब्द मेरे दिल पर हथौड़ की तरह लगा। मेरा भीतर तक कांप गया।
"नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकती। जीवन ईश्वर से मिला वरदान है, इसे मिटाने का कोई हक नहीं है तुम्हें.....! तुम्हें अपनी परिस्थितियों से लड़ना चाहिए।" मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि इस चार सालों में विभा की हंसती- खेलती जिंदगी नरक हो जाएगी। उनके सपने ही नहीं उनके अस्तित्व को भी कुचल दिया जाएगा।
विभा मेरी बाल- सखा थी। पढ़ाई से लेकर पिटाई तक वह मेरी साझेदार थी।
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