कथासम्राट् प्रेमचंद : उदात्त चरित्र के परिकल्पक

 कथाकार प्रेमचंद : उदात्त चरित्र के परिकल्पक  

                               -डाॅ. उमेश कुमार शर्मा      

            प्रेमचंद मुख्यत: कथाकार के रूप में हमारे सामने आते हैं। वे हिन्दी के कथा-सम्राट् कहे जाते हैं। उन्होंने लगभग सोलह उपन्यास और तीन सौ अमर कहानियों का सृजन किया है। प्रेमचंद का कथा-साहित्य भारतीय सामाजिक- राजनीतिक आंदोलनों तथा वैश्विक क्रांतियों का दस्तावेज है। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी, रामकृष्ण मिशन समेत मार्क्स, गांधी और अंबेडकर के विचारों के फलस्वरूप भारतीय समाज में जो परिवर्तन हुए थे, प्रेमचंद ने उनकी कथात्मक अभिव्यक्ति की है। दूसरी ओर फ्रांस और रूस की राज्य क्रांति, के दौरान वहाँ के बुर्जुआ वर्ग ने आभिजात्यों से जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता की मांग की थी, उसकी स्पष्ट झलक प्रेमचंद के कथा-साहित्य में दिखाई पड़ती हैं। उनका कथा-साहित्य टाॅल्सटाॅय, मैक्सिम गोर्की और चेखव का भारतीय संस्करण है। 

           प्रेमचंद के साहित्य की मूल चेतना मनुष्य की सहजता का अन्वेषण और उसकी प्रतिष्ठा है। वे मनुष्य को विधि-निषेध की दीर्घकालीन जर्जर मान्यताओं से निरपेक्ष, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों से परे, बन्धन और मोक्ष के चक्कर से दूर अकृत्रिम और प्रकृत रूप में देखना चाहते थे। उनके कथा- साहित्य ने आभिजात्यवादी फर्मे को ध्वस्त कर दिया। उनके कथा-कहानियों में पहली बार आम आदमी प्रतिष्ठित हुए। 'गोदान' में प्रोफेसर मेहता, जो प्रेमचन्द के आदर्शों के मूर्तरूप हैं, कहते हैं- "मैं प्रकृति का पुजारी हूँ और मनुष्य को उसके प्राकृतिक रूप में देखना चाहता हूँ, जो प्रसन्न होकर हँसता है, दुःखी होकर रोता है और क्रोध में आकर मार डालता है।........जीवन मेरे लिए आनन्दमय क्रीड़ा है, सरल, स्वच्छन्द, जहाँ कुत्सा, ईर्ष्या और जलन के लिए कोई स्थान नहीं। .........जहाँ जीवन है, चहक है, प्रेम है, वहीं ईश्वर है; और जीवन को सुखी बनाना ही उपासना है और मोक्ष है।" प्रेमचन्द द्वारा मनुष्य के इस सहज रूप की कल्पना गांधी के आदर्श मानव से एकदम भिन्न है, गांधी का आदर्श मानव 'सत्याग्रही' है। सत्याग्रही क्रोधजयी होता है। वह दीर्घकालीन संयम से अपने को अनुशासित करके अहिंसक पद्धति का अनुसरण करते हुए सत्य के आदर्श की प्रतिष्ठा करना चाहता है। प्रेमचन्द गांधी के सिद्धान्तों को पूर्णतः स्वीकार नहीं करते। उन्हें मनुष्यता का सहज रूप गाँवों में अधिक दिखाई देता है। इसीलिए वे अपने आदर्श कथानायकों को गाँवों में ही सक्रिय दिखाते हैं। गाँवों के अकृत्रिम सौन्दर्य को विकृत करने में अज्ञान, अन्धविश्वास, भेदभाव, निराशा, दैन्य, वाह्याचार और स्वार्थवृत्ति प्रधान कारण हैं। इन्हें दूर करके प्रेम, सहयोग और समता के आधार पर गाँवों को स्वर्ग बनाया जा सकता है। प्रेमचन्द का यह विश्वास अन्त तक बना रहा। वे संसार को ईश्वर का विराट् रूप मानते थे। संसार से कटकर एकान्त साधना की बात उनके लिए एक प्रकार की पलायन-वृत्ति थी। वे जीवन में उद्योग, अध्यवसाय और कठोर परिश्रम के द्वारा उन्नति का पथ प्रशस्त करना चाहते थे। उन्हें मनुष्य क्या, प्राणिमात्र से गहन सहानुभूति और अकृत्रिम ममत्व था। इसीलिए अच्छे-बुरे, गरीब-अमीर सभी तरह के पात्र उनकी सहानुभूति पा सके हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि 'प्रेमचंद नास्तिक थे, वे कभी एक लोटा जल लेकर किसी देवालय में अर्घ्य देने नहीं गये, परंतु देश की भूखी-प्यासी, पीड़ित जनता की पुकार सुनकर, उसका आँसू पोछने अपना फटा अंगोछा लेकर सबसे आगे दौड़ पड़ते थे। 

             'प्रेमाश्रम' के ज्ञानशंकर, 'गोदान' के अमरपाल सिंह, 'कायाकल्प' के गुरुसेवक, 'कर्मभूमि' के महन्तजी सभी महत्त्वाकांक्षी और अत्याचारी पात्र हैं; किन्तु इन्हें भी प्रेमचन्द की सहानुभूति प्राप्त है। वे कथा के विकासक्रम में ऐसे संदर्भ उपस्थित कर देते हैं, जब क्रूर और कठोर पात्रों के भी मर्म का उद्घाटन हो जाता है। वे अपनी सफाई देने लगते हैं। परिस्थितियों की अनिवार्यता और अपनी विवशता का रोना रोते हैं और पाठक उन्हें क्षमा कर देता है। ये पात्र सर्वत्र नीतिवश मुखौटा लगाकर ऐसा करते हैं, यह नहीं कहा जा सकता। प्रेमचन्द को मानव-चरित्र की विविधता, जटिलता और रहस्यमयता का अच्छा ज्ञान था। घटनाएँ भावनाओं को प्रभावित करती हैं और भावनाओं का चढ़ाव-उत्तार व्यक्ति के आचरण को परिवर्तित करता रहता है। प्रेमचन्द इस तथ्य से परिचित हैं। 'कायाकल्प' में 'चक्रधर' का चरित्र इसका प्रमाण है। गोदान में 'गोबर' के व्यक्तित्व में होनेवाला परिवर्तन परिस्थितियों के परिवर्तन का ही परिणाम है। प्रेमचन्द देख रहे थे कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन के मूल्य बदल रहे हैं और उनका प्रभाव लोगों के विचारों एवं आचारों पर पड़ रहा है। भारतीय नवयुवक विदेशों से भी प्रभाव ग्रहण कर रहे हैं। स्वयं भारत में होने वाले सामाजिक और राजनैतिक आन्दोलन नवयुवकों को नये साँचे में ढाल रहे हैं। वे चरित्रों की अवतारणा करते समय इस परिवर्तन के अकाट्य नियम का ध्यान रखते हैं। 'गोदान' में अमरपाल सिंह के पुत्र रुद्रपाल सिंह उनसे भिन्न संस्कार रखते हैं। 'प्रेमाश्रम' में प्रभाशंकर और ज्ञानशंकर की मान्यताएँ अलग-अलग हैं। 'कायाकल्प' में मुंशी वज्रधर और उनके पुत्र चक्रधर के आदर्शों में जमीन-आसमान का अन्तर है। प्रेमचन्द को यह भी पता था कि एक उदात्त स्थायी वृत्ति मनुष्य को अनेक दुर्गुणों से बचाती रहती है। ज्ञानशंकर के चारित्रिक पतन की मीमांसा करते हुए वे कहते हैं- "जो प्राणी प्रेम कर सकता है, वह धर्म, दया, विनय आदि सद्गुणों से शून्य नहीं हो सकता। प्रेम की ज्योति उनसे हृदय को प्रकाशित करती रहती है; लेकिन जो प्राणी प्रेम का स्वांग भरकर अपना कुटिल अर्थ सिद्ध करता है...... उससे ज्यादा नीच नराधम कोई हो ही नहीं सकता।''

              प्रेमचन्द का दृष्टिकोण किसी भी बिन्दु पर संकीर्ण नहीं था। जातिगत भेदभाव, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, किसान-जमींदार संघर्ष, स्त्रियों की शिक्षा, विधवा-विवाह, अछूतों का प्रश्न, महाजन और कर्जदार की समस्या, प्रान्तीयता और राष्ट्रीयता, हिन्दी और उर्दू आदि जितने भी प्रश्न उनके सामने थे, सभी के संदर्भ में उन्होंने उदार और प्रगतिशील विचार व्यक्त किये हैं। उनका सुधारवादी दृष्टिकोण निरंतर गतिशील रहा है। इसीलिए अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर वे आज के प्रगतिवादी विचारकों से भी आगे हैं। अपनी इस सहजता, अकृत्रिमता, उदारता, मानव-प्रेम, व्यापक सहानुभूति, प्रगतिशील दृष्टिकोण और मानव-मनोविज्ञान की परख आदि विशेषताओं के कारण वे सदैव अमर रहेंगे। उनमें एक महान् कलाकार के सभी गुण विद्यमान हैं। आज उपन्यास और कहानी-कला में अभूतपूर्व निखार आ गया है। मनोविज्ञान की गहन विश्लेषण दृष्टि कलाकारों को प्राप्त है। किन्तु मनुष्य के प्रति मंगलाकांक्षा से प्रेरित जो ममत्वपूर्ण सहानुभूति प्रेमचन्द में है, वह आज भी अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचंद ने अपने कहानी और उपन्यास के बहाने अनेक उदात्त चरित्र का निर्माण किया है। उनकी खासियत है कि वे मनुष्य को मनुष्यता की सीमा से कभी गिरने नहीं देते हैं। उनके यहाँ समय के साथ खल पात्रों का भी कायान्तरण हो जाता है, और वे पाठकीय सहानुभूति के अधिकारी हो जाते हैं। इसीलिए प्रेमचंद साहित्य के अधिकांश चरित्र अनुकरणीय हैं। 

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सम्प्रति : सहायक आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, श्री राधा कृष्ण गोयनका महाविद्यालय, सीतामढ़ी, (बिहार)

संपर्क- 6201464897 

      

 

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Milan Tomic

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