मानवीय संभावनाओं का उत्कर्ष हैं श्रीकृष्ण
-डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
पाश्चात्य अस्तित्वादी चिंतक नीत्शे का कथन- 'ईश्वर कैदखाने में पैदा हुए और पागलखाने में मारे गये'- भगवान श्रीकृष्ण पर एकदम फिट बैठता है। चूँकि कृष्ण वास्तव में कैदखाने में पैदा हुए, सावन की घनघोर अंधेरी रात में, प्रकृति की प्रतिकूलता के बीच। और उनका वध एक सामान्य आखेटक के हाथों वहाँ हुआ, जहाँ का वातावरण पागलखानों जैसा ही था। कैदखाने से जीवन की शुरुआत करनेवाले कृष्ण द्वारिका के अघोषित सम्राट और महाभारत के महानायक बनते हैं। यह सही मायने में उनके अनवरत संघर्ष की परिणति है। कृष्ण के संघर्ष को देखिये कि चारों ओर का वातावरण उनके अस्तित्व को मिटा देने पर अमादा है, पर वे हैं कि आततायी शक्तियों से टक्कर पर टक्कर ले रहे हैं। अभी तो उनका जन्म ही हुआ था कि कंस की प्रेरणा से मायावी राक्षसी 'पूतना' प्रस्तुत हो गयी उसे मिटाने। बकासुर, शकटासुर, कालिया नाग, चानूर और कंस का सामना उन्हें खेलने के उम्र में ही करना पड़ा। फिर भी कृष्ण ने इन आततायियों से न केवल स्वयं की रक्षा की, वरन अपने समाज की भी रक्षा की।
उनके जीवन की क्या विडंबना है कि जो मां उन्हें जन्म देती हैं, वह पालन नहीं करतीं। जो पालन करती हैं, वह उनका जन्मदात्री नहीं हैं। वे जिनसे प्रेम करते हैं, उनसे विवाह नहीं हो पाता। जिनसे विवाह होता है, वह राधा की भांति प्रेम नहीं करतीं।
हिन्दू दशावतारों में श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। अवतारवाद के माध्यम से भारतीय धर्मशास्त्र प्राणियों के विकास की जो कहानी हजारों साल पहले कही है, वही सिद्धान्त के रूप में पश्चिमी देशों में दो-ढाई सौ साल पूर्व चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि 'प्राणियों की उत्पत्ति जल-स्रोत से हुआ है। समय के साथ अनुकूलन के आधार पर अपनी परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए प्राणी विकसित हुआ है। उनमें उत्तरोत्तर अनुकूलन के गुणों का विकास होता गया। जो प्राणी अपने परिवेश के साथ अनुकूलन नहीं कर पाया, उनका अस्तित्व समाप्त हो गया।
भारतीय अवतारवाद की कथा भी विकास की क्रमिकता पर जोर देता है। यहाँ प्रथमत: 'मत्स्य' अर्थात (मछली) अवतार का उल्लेख किया जाता है, जिसका जीवन जल में विकसित होता है। इसके बाद कश्यप अवतार, जो जल और स्थल में रह सकता है। इसके बाद वाराह अवतार, जल, स्थल और कीचड़ में समान रूप से रह सकता है। इसके बाद नरसिंह अवतार पशु और मानव का संयुक्त अवतार है। फिर एक लघु आकार का मानव-अर्थात वामन अवतार। इसके बाद प्रमुख अवतारों में भगवान परशुराम का अवतार माना जाता है। परशुराम रूपाकार की दृष्टि से पूर्ण मानव हैं, पर उनमें मानवोचित गांभीर्य नहीं है। वह अपने पिता का आदेश पाकर माँ का वध कर डालता है। परशुराम सही अर्थों में 'एंग्रीमैन' हैं। इन्होंने पृथ्वी को सत्रह बार क्षत्रिय-विहीन कर डाला।
दशावतारों में राम और कृष्ण सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। राम मर्यादापुरुषोत्तम रूप में ख्यात हैं। भगवान श्रीराम न केवल रूप और आकार से परिपक्व मानव हैं, बल्कि उनमें शक्ति के साथ सौन्दर्य और शील भी है। वे कभी भी क्रोधातुर होकर मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते। कृष्णावतार में अपेक्षाकृत लोकमंगल का भाव अधिक है। कृष्ण में शक्ति, सौन्दर्य और शील के अतिरिक्त है- 'विरुद्धों का सामंजस्य'। उनका व्यक्तित्व और चरित्र बहुआयामी है। वे भोगी भी हैं और योगी भी। वे आसक्त भी हैं और अनासक्त भी। वे माखन भी चुराते हैं, और गोपिकाओं के वस्त्र भी। वे बासुरी भी धारण करते हैं सुदर्शन चक्र भी। वे सबसे बड़े प्रेमी भी हैं और निर्मोही भी। वे परम योद्धा भी हैं और रणछोर भी। वे शांति दूत भी हैं और महासंग्राम के सूत्रधार भी। वे जितनी सिद्धत से दोस्ती निभाते हैं, उतनी ही सिद्दत से दुश्मनी भी।
श्रीकृष्ण वास्तव में परात्पर हैं। गीता में उन्होंने स्वयं अपने बारे में कहा है कि- 'हे पार्थी में वृक्षों में वटवृक्ष हूँ। नागों में नागराज वासुकी। मैं पर्वतों में पर्वतराज हिमालय हूँ, तो नदियों में देवनदी गंगा। मैं प्राणियों में प्राणी श्रेष्ठ मनुष्य हूँ, नर रूप में नारायण।" कृष्ण का यह कथन मानवीय संभावनाओं के उत्कर्ष को दिखलाता है।
वे कदापि परिस्थितियों का दासत्व स्वीकार नहीं करते। श्रीकृष्ण का जीवन मानवता का प्रकाश पुंज है। अस्तित्ववाद की भाषा में कहें तो कृष्ण स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं। कृष्ण अपने देशकाल की उपज थे। उन्होंने राजपूती शक्तियों को टक्कर देकर एक नयी शक्ति का अवतरण किया।
कृष्ण के विराट और बहुआयामी जीवन को लीला-मात्र समझने की भूल नहीं करना चाहिए। कृष्ण ने अपने जीवन को विविध संदर्भों में सफलतापूर्वक जिया है, वे लीला नहीं करते। श्रीकृष्ण के जीवन को लीला के रूप में प्रचारित करना उचित नहीं है। न ही कृष्ण का दैवीकरण समाज के लिए हितकर है। कृष्ण एक पूर्ण मनुष्य हैं। वैसा मनुष्य जो लकीर का फकीर बन जाना नहीं स्वीकारता।
कृष्ण के जीवन का रास-लीला को रस-लीला रूप में प्रचारित करना या राधा-कृष्ण के प्रेम की अश्लील व्याख्या करना, कृष्ण के कृष्णत्व को मूल्यहीन बनाता है। रास लीला के निमित्त शरद पूर्णिमा की रात्रि में जब कृष्ण कामोत्तेजक धुन बजाकर गोपिकाओं को आमंत्रित करते हैं तो गोपिकाएँ तमाम मर्यादाओं का अतिक्रमण कर कृष्ण के पास पहुंच जाती हैं। यह स्त्री-जाति के दमित कामभाव के साथ ही स्त्री-स्वातंत्र्य की अभिव्यक्ति है। रास नृत्य के दौरान कृष्ण केन्द्र में होते हैं और गोपिकाएँ चारों ओर एक-दूसरे से हाथ जोड़े नृत्य करती हैं। प्रतीकात्मक रूप में गोपिकाएँ अगर नश्वर शरीर हैं तो कृष्ण उनमें संचरित प्राण-शक्ति हैं। गोपिकाएँ सृष्टि का प्रसार हैं तो कृष्ण उसे संचालित करने वाला परम ब्रह्म।
बात प्रेम की ही करें तो राधा और कृष्ण का प्रेम शाश्वत है। इस प्रेम में कोई बंधन नहीं है। बंधन कभी प्रेम हो भी नहीं सकता। राधा और कृष्ण प्रेम में अपनी वैयक्तिक सत्ता को एक-दूसरे में खपा देते हैं। इस प्रेम में कोई 'अहं' का भाव नहीं हैं। इसी को आचार्य रजनीश ने 'प्रेम में 'ईगोलेस' हो जाना कहा है।
कृष्ण ऐतिहासिक- पौराणिक नायक हैं या काल्पनिक...? इसपर शीतयुद्ध करने से बेहतर है, कृष्ण के विराट और बहुआयामी व्यक्तित्व को अपने में आत्मसात कर लेना। कृष्ण के कृष्णत्व को अपने में उतार लेना। और प्रकाशपुंज बनकर समाज और राष्ट्र को रोशन करना।
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