राधा : प्रेम की अधिष्ठात्री
डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
'राधा' का नाम जहन में आते ही मानव- मन जो प्रतिमा उद्भूत होती है, उसे प्रेम की अधिष्ठात्री कहा जा सकता है। राधा कृष्ण-साहित्य की धीरोदात्त नायिका है। वैष्णवों के तीन प्रसिद्ध ग्रंथ-'हरिवंश पुराण, 'विष्णुपुराण' और 'भागवत पुराण' हैं। लेकिन, इनमें से किसी में भी राधा नाम का उल्लेख नहीं हुआ है। भागवत पुराण में कथा आई है कि कृष्ण ने मथुरागमन के पूर्व सभी गोपियों को छोड़कर एक गोपी से अलग मुलाकात की थी। बस, भक्तगण इसे ले उड़े और उसी गोपी को 'राधा' कहने लगे। पंडितों का यह भी विचार है कि कृष्ण-चरित के साथ बाल-लीला की कथा पहले से शुरू हुई, राधा तथा अन्य गोपियों के साथ उनकी प्रेम-लीला की कहानियाँ बहुत बाद में प्रचलित हुई।
राधा का नाम कैसे चला......! यह गहरे विवाद का विषय है। 'नारद-पाँच-रात्र-संहिता' में लिखा है कि एक ही भगवान् पुरुष और स्त्री रूप में प्रकट होते हैं। सम्भव है, इस दार्शनिक कल्पना से ही बाद के कवियों ने, जैसे शिव के साथ पार्वती और विष्णु के साथ लक्ष्मी हैं, उसी तर्ज पर कृष्ण के साथ एक जोड़ी मिलाने के लिए (राधा) की कल्पना कर ली हो। लेकिन, सवाल यह है कि राधा का नाम आया कहाँ से....? और फिर यह क्यों हुआ कि बालक कृष्ण के साथ युवती राधा की अनमेल जोड़ी मिला दी गई? भागवत सम्प्रदाय और माध्व सम्प्रदाय राधा को नहीं मानते हैं। असम में भी वैष्णवों के बीच राधा की पूजा का प्रचलन नहीं है। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'मध्यकालीन धर्म-साधना' में यह भी लिखा है कि प्रेम-विलास और भक्ति-रत्नाकर के अनुसार, 'नित्यानन्द प्रभु की छोटी पत्नी जाह्नवी देवी, जब वृन्दावन गई, तो उन्हें यह देखकर बड़ा दुःख हुआ कि श्रीकृष्ण के साथ राधा नाम की मूर्ति की कहीं पूजा नहीं होती थी। घर लौटकर उन्होंने नयनभास्कर नामक कलाकार से राधा की मूर्तियाँ बनवाई और उन्हें वृन्दावन भिजवाया। जीव गोस्वामी की आज्ञा से यह मूर्ति श्रीकृष्ण के पार्श्व में रखी गई और तब से श्रीकृष्ण के साथ राधिका की भी पूजा होने लगी।
दूसरी ओर, जो भी सम्प्रदाय भागवत के बाद वाले पुराणों को मानते हैं, वे राधा को भी स्वीकार करते हैं। इसलिए, यह बहुत सम्भव दीखता है कि आर्यों के वैष्णव धर्म में कृष्ण की बाल-लीला और राधा से उनके प्रेम की कल्पना किसी आर्येतर जाति से आई हो। इस सम्बन्ध में एक मिथ यह है कि बाल-लीला की कल्पना आभीर-जाति के किसी बाल-देवता से मिली है और राधा भी, सम्भवतः, दक्षिण के किसी आर्येतर समाज की कोई 'प्रेम की देवी' रही होंगी। कालक्रम में ये दोनों कथाएँ वासुदेव धर्म से आ मिलीं और धीरे-धीरे, बदलकर कृष्ण का वह रूप हो गया, जिसे हम आज देखते हैं। इस अनुमान को एक समर्थन तो इस बात से भी मिलना चाहिए कि 'निम्बार्क संप्रदाय' के प्रवर्तक निम्बार्क महाराज दक्षिण के ही थे और उत्तर भारत में फैलने के पहले कृष्ण भक्ति के सिलसिले में राधा-भक्ति का भी प्रचार दक्षिण में ही हुआ, जिसके प्रचारक आलवार भक्त थे। दक्षिण की भगतिन आन्दाल जो मीरा से बहुत पहले हुई, अपने आपको राधा मानती थीं। इसके विपरीत, कृष्ण साहित्य के कुछ विद्वान यह कहते हैं कि कोई आधार नहीं मिलने से अनुमान यही होता है कि राधा की कल्पना भागवत की खास गोपी को लेकर वृन्दावन में उठी और वहीं से सर्वत्र फैली है।
भारतीय साहित्य में राधा-कृष्ण चरित्र को लेकर जितनी विविधता मिलती है, उतनी कहीं नहीं। राधा और कृष्ण भारतीय मानस की तमाम संभावनाओं पर फिट बैठते हैं। कृष्ण योगेश्वर भी हैं और कामेश्वर भी। इसी प्रकार राधा बैकुंठ की लक्ष्मी- स्वरूपा भी हैं और नायक कृष्ण की कामोत्पादिका भी। राधा को लेकर भारतीय वांग्मय में चाहे जितनी कल्पना हुई हो, वह सर्वत्र एक प्रेमिका के रूप में ही है। राधा के प्रेम में समर्पण भी है और त्याग भी। वह कृष्ण के लिए स्वयं को 'फना' कर देती हैं। कृष्ण में वह अपने संपूर्ण अस्तित्व का लोप कर देती हैं। उनके प्रेम में केवल उत्सर्ग है, वह प्रेम में प्रतिदान की कामनक नहीं करतीं। कृष्ण की बेवफाई के प्रति भी उपालंभ का भाव नहीं रखती हैं। वह छोड़कर जाने वाले कृष्ण को श्रापित नहीं करती है, बल्कि इसके लिए भी वह अपने भाग्य को ही कोसती है। महाकवि विद्यापति ने ठीक ही लिखा है-
''जुग- जुग जीवथु बसतु लाख कोस।
हमर अभाग हुनक नहीं दोस।।
हमर अभाग भेल विधि विपरीत।
माधव तेजल पुरूब पिरीत।।"
विद्यापति ने राधा-कृष्ण के प्रेम का मनोरम वर्णन किया है। उन्होंने राधाकृष्ण को देवत्व की भावभूमि से उतारकर मानवीय सीमाओं तक ला दिया है। वह राधा ही थी, जिनसे मिलने की आतुरता ने कृष्ण को व्याकुल कर रखा है। 'पदावली' में राधा के प्रति कृष्ण की आतुरता स्वाभाविक प्रतीत होती है। चूँकि स्त्री कभी आगे होकर प्रेम निवेदन नहीं करती। वह वर्षों इंतजार करती है। वह पुरुष की भाँति शीघ्रता नहीं करती। पदावली में लिखा गया है -
"नंदक नंदन कदंबक तरु तर धीरे- धीरे मुरली बजाव।
समय संकेत निकेतन बइसल बेरि- बेरि बोल पठाव।।"
यह सर्वविदित है कि विद्यापति जयदेव से प्रभावित हैं। जयदेव ने राधा और कृष्ण को एक सामान्य नायक- नायिका की भाँति केलि-क्रिया करते हुए दिखाया है। यह अलग सवाल है कि इससे भारतीय मानस में राधाकृष्ण के प्रति भक्ति- भावना खंडित हुई है।
सूर- साहित्य में उपस्थापित राधा- कृष्ण विद्यापति का अगला संस्करण है। यहाँ भी राधा और कृष्ण के कामभाव को अभिव्यक्त किया गया है। 'भ्रमरगीत' के बहाने सूरदास ने कृष्ण को कटघरे में खड़ा किया है। चूँकि भ्रमर की तरह कृष्ण भी बेवफा है। तथापि गोपिकाएं, जिनमें राधा भी शामिल हैं, कृष्ण से एकनिष्ठ प्रेम को अभिव्यक्त करती हैं। वे उधव जी से कहती हैं-
"ऊधो मन नाही दस-बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधे ईस।।"
भ्रमरगीत- परंपरा में भी गोपिकाओं के चरित्र में एकरूपता नहीं मिलती है। कहीं वह अपने तर्क से उधव को हराती हैं, तो कहीं अपनी कटुक्ति से आहत कर देती हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य में हरिऔध ने 'प्रियप्रवास' लिखकर राधा के परंपरागत चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन किया। यहाँ वह वियुक्ता नायिका के फर्मे में तोड़ देती हैं। वह कृष्ण के वियोग में आँसू बहाना छोड़कर उसके जीवन- दृष्टि का अनुकरण करती हैं। यहाँ राधा में विश्वमानवता का भाव अंतर्निहित है। वह कृष्ण को न केवल अपने बाहुपाश से मुक्त करती हैं, वरन् उनसे दूर रहकर भी उनके नक्शेकदम पर चलती है। प्रियप्रवास में राधा का उक्ति देखिये -
"प्यारे जीवे जगहित करे, चाहे गेह न आवे।"
इस तरह राधा के चरित्र में उत्तरोत्तर परिवर्तन हुआ है। राधा के बिना कृष्ण की कल्पना नहीं की जा सकती है। राधा कृष्ण चरित्र का आईना है। वर्तमान समय में जबकि प्रेम छल का पर्याय बनकर रह गया है। मिलावट के इस युग में, जबकि शुद्ध और नि:स्वार्थ प्रेम दुर्लभ हो गया है। राधा का चरित्र प्रेम का प्रकाशपुंज है। उनका प्रेम ही निकष है- सच्चे प्रेम का, जिसपर हम स्वयं का मूल्यांकन कर सकते हैं।
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